बागपत
श्रद्धा से श्राद्ध तक, लेकिन जीवित माता-पिता के लिए क्यों नहीं?
क्या हमारी संवेदनाएं मृत्यु के बाद जागती हैं और जीवन में सो जाती हैं?
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बागपत : पितृपक्ष आते ही देशभर में अपने पूर्वजों को याद करने, तर्पण करने, श्राद्ध और दान-पुण्य करने की परंपरा शुरू हो जाती है। धार्मिक मान्यताओं में श्राद्ध को पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का माध्यम माना गया है। वर्ष 2026 में भी पितृपक्ष 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक मनाया जा रहा है और इन दिनों तर्पण, पिंडदान तथा दान-पुण्य किए जा रहे हैं।
लेकिन इसी के साथ एक सवाल समाज के सामने खड़ा होता है—जिस मां-बाप ने हमें जन्म दिया, उंगली पकड़कर चलना सिखाया, अपनी जरूरतें छोड़कर हमारी जरूरतें पूरी कीं, क्या उनके जीवित रहते उनकी सेवा और सम्मान ही सबसे बड़ा श्राद्ध नहीं होना चाहिए?
विडंबना देखिए, कई बार माता-पिता के निधन के बाद उनके नाम पर बड़े-बड़े आयोजन होते हैं। भोज होते हैं, दान किया जाता है, धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। लेकिन जब वही माता-पिता जीवित होते हैं और उन्हें सहारे, दवा, बातचीत और अपनापन चाहिए होता है, तब कुछ बुजुर्ग वृद्धाश्रम की चौखट तक पहुंच जाते हैं।
हाल ही में आगरा के एक वृद्धाश्रम से जुड़ी घटना ने इसी सवाल को सामने रखा। पितृपक्ष शुरू होने के दौरान कुछ बुजुर्ग आश्रम पहुंचे, वहीं एक दंपती के बच्चे पितृपक्ष के अवसर पर अपने माता-पिता को वापस घर ले गए। यह घटना कम से कम इतना सोचने को मजबूर करती है कि पितरों को याद करने की परंपरा के साथ जीवित माता-पिता की जिम्मेदारी को भी उतनी ही गंभीरता से समझना चाहिए।
वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं, सवाल परिवार से भी है
भारत में बुजुर्गों की देखभाल की पारंपरिक व्यवस्था मुख्यतः परिवार आधारित रही है। सरकार भी मानती है कि देश में वृद्ध देखभाल में परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका है। जरूरतमंद बुजुर्गों के लिए सरकार की योजनाओं के तहत वृद्धाश्रमों को सहायता दी जाती है। 2023 में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने बताया था कि योजना के तहत 603 वरिष्ठ नागरिक गृहों को सहायता दी जा रही थी।
इसका मतलब यह नहीं कि हर वृद्धाश्रम किसी परिवार की विफलता है। कई बुजुर्ग ऐसे भी होते हैं जिनका कोई सहारा नहीं होता या जिन्हें विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। इसलिए वृद्धाश्रम अपने आप में गलत नहीं हैं।
गलत तब है जब सक्षम परिवार अपने जीवित माता-पिता को जिम्मेदारी समझने लगे और उन्हें अकेलेपन के हवाले कर दे।
श्राद्ध की असली भावना क्या हो?
श्राद्ध शब्द की मूल भावना ही श्रद्धा से जुड़ी है। यदि हम अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा रखते हैं तो उनकी स्मृति को केवल एक दिन के कर्मकांड तक सीमित क्यों रखें?
मां-बाप जीवित हैं तो उनके साथ बैठना, उनका हाल पूछना, उनकी दवा समय पर दिलाना, उन्हें सम्मान देना, उनकी बात सुनना और उन्हें यह महसूस कराना कि वे परिवार पर बोझ नहीं बल्कि परिवार की नींव हैं—यह भी श्रद्धा का ही रूप है।
मृत्यु के बाद तस्वीर पर माला चढ़ाने से पहले जीवन में उनके कंधे पर हाथ रखना ज्यादा जरूरी है।
आज जरूरत इस बात की है कि पितृपक्ष केवल मृत पूर्वजों को याद करने का अवसर न बने, बल्कि परिवारों के लिए जीवित बुजुर्गों के प्रति अपने कर्तव्य को याद करने का अवसर भी बने।
हम अपने बच्चों को संस्कार देने की बात करते हैं। लेकिन बच्चों को संस्कार भाषणों से कम और हमारे व्यवहार से ज्यादा मिलते हैं। यदि बच्चे यह देखेंगे कि दादा-दादी या माता-पिता का सम्मान किया जा रहा है, उनकी जरूरतों का ध्यान रखा जा रहा है, तो वही संस्कार अगली पीढ़ी तक पहुंचेंगे।
एक सवाल खुद से पूछिए
अगली बार जब आप किसी दिवंगत पूर्वज के नाम पर श्राद्ध करें, उससे पहले एक बार अपने घर के जीवित बुजुर्ग के पास बैठिए।
पूछिए—“आपको किसी चीज की जरूरत तो नहीं?”
शायद यही वह श्राद्ध होगा जिसमें कर्मकांड से ज्यादा इंसानियत होगी।
श्रद्धा केवल तस्वीर के सामने सिर झुकाने का नाम नहीं है।
श्रद्धा तो उस इंसान का हाथ थामने का नाम है, जिसने कभी हमें गिरने नहीं दिया।

