बागपत
गुरु की शरण में मिटते हैं जीवन के अंधकार, भक्ति से खुलते हैं मोक्ष के द्वार
बाबा मोहनराम आश्रम में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

राजर्षि गुरुदेव तेजवीर सिंह खोखर ने गुरु महिमा, मनुष्य जन्म और गृहस्थ जीवन में मोक्ष प्राप्ति का बताया मार्ग; सत्संग के बाद सैकड़ों भक्तों की समस्याएं सुनकर दिए उपाय
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
हलालपुर, बागपत। मनुष्य जीवन अनमोल है, लेकिन सांसारिक मोह-माया में उलझकर इंसान अक्सर अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूल जाता है। धन-दौलत, परिवार, मान-सम्मान और सुख-सुविधाओं की दौड़ में मनुष्य को आत्मिक शांति की तलाश रहती है। ऐसे में गुरु का सानिध्य जीवन को नई दिशा देने के साथ मन को शांति और भक्ति का मार्ग दिखाता है। इसी आध्यात्मिक संदेश के साथ बाबा मोहनराम आश्रम, शंकराचार्य मार्ग, हलालपुर, बागपत में भव्य सत्संग कार्यक्रम श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर राजर्षि गुरुदेव तेजवीर सिंह खोखर ने बाबा मोहनराम जी के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को गुरु की महिमा, मनुष्य जन्म की दुर्लभता, गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों और मोक्ष प्राप्ति के मार्ग के बारे में विस्तार से समझाया। सत्संग के उपरांत गुरुदेव ने सैकड़ों भक्तों की समस्याएं सुनीं और उन्हें मौके पर ही उचित मार्गदर्शन एवं उपाय बताए।
गुरु के बिना आध्यात्मिक राह पहचानना कठिन
गुरुदेव ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि गुरु केवल उपदेश देने वाले नहीं, बल्कि मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान और निराशा से आशा की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक होते हैं। जिस प्रकार घने अंधकार में एक दीपक रास्ता दिखाता है, उसी प्रकार गुरु का ज्ञान जीवन की कठिनाइयों में सही दिशा दिखाता है।
उन्होंने कहा कि संसार रूपी भवसागर में मनुष्य मोह, लोभ, क्रोध, अहंकार और अनगिनत इच्छाओं के भंवर में फंस जाता है। ऐसे में गुरु का मार्गदर्शन उसे अपने भीतर झांकने, गलतियों को पहचानने और जीवन को सही दिशा देने की प्रेरणा देता है। गुरु धारण करना केवल एक परंपरा निभाना नहीं, बल्कि सत्य, प्रेम, सेवा, अनुशासन और भक्ति के मार्ग पर चलने का संकल्प लेना है।
गुरुदेव ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि गुरु के प्रति श्रद्धा तभी सार्थक होती है, जब उनके बताए सद्मार्ग को जीवन में अपनाया जाए। मन में विनम्रता, वाणी में मधुरता और व्यवहार में ईमानदारी हो, तभी आध्यात्मिक शिक्षा जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला सकती है।
मनुष्य जन्म मिला है तो जीवन को सार्थक बनाएं
गुरुदेव ने मनुष्य जन्म को अत्यंत दुर्लभ और अनमोल बताते हुए कहा कि इस जीवन का महत्व केवल सांसारिक उपलब्धियों से नहीं आंका जा सकता। इंसान अपने जीवन में कितना धन कमाता है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह कितने अच्छे कर्म करता है और कितने लोगों के दुख-दर्द में साथ खड़ा होता है।
उन्होंने कहा कि समय एक बार बीत जाने के बाद लौटकर नहीं आता। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन का बहुमूल्य समय व्यर्थ के विवाद, ईर्ष्या और अहंकार में गंवाने के बजाय ईश्वर के स्मरण, सत्संग, प्रार्थना और मानव सेवा में लगाना चाहिए। जरूरतमंद की सहायता करना, माता-पिता का सम्मान करना, किसी दुखी व्यक्ति को सहारा देना और किसी का दिल न दुखाना भी सच्ची भक्ति के महत्वपूर्ण स्वरूप हैं।
गृहस्थ जीवन में रहकर भी मिल सकता है मोक्ष
गुरुदेव ने गृहस्थ आश्रम को जीवन की सबसे कठिन जिम्मेदारियों में से एक बताते हुए कहा कि परिवार की जिम्मेदारियां निभाना, बच्चों का भविष्य संवारना, माता-पिता की सेवा करना और समाज के प्रति अपने दायित्व पूरे करना आसान नहीं है। इसके बावजूद गृहस्थ जीवन को आध्यात्मिक उन्नति में बाधा नहीं मानना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति के लिए संसार और परिवार से विमुख होना आवश्यक नहीं है। मनुष्य अपने परिवार का पालन-पोषण करते हुए, ईमानदारी से व्यवसाय करते हुए और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए भी ईश्वर से जुड़ा रह सकता है। जरूरत इस बात की है कि मन में प्रभु के प्रति श्रद्धा हो, कर्मों में पवित्रता हो और व्यवहार में दया तथा करुणा हो।
गुरुदेव ने समझाया कि सच्ची साधना केवल मंदिर में माथा टेकने तक सीमित नहीं है। अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाना, जरूरतमंदों की सहायता करना, लोभ और अहंकार से बचना तथा सुख-दुख में परमात्मा का स्मरण करना भी भक्ति का मार्ग है। गृहस्थ जीवन में रहकर भी मनुष्य अपने कर्मों और भक्ति के माध्यम से आत्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
निगुरा व्यक्ति के विषय में भी किया वर्णन
सत्संग के दौरान गुरुदेव ने बिना गुरु धारण किए रहने वाले व्यक्ति, जिसे धार्मिक परंपरा में ‘निगुरा’ कहा जाता है, के विषय में भी विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने गुरु के मार्गदर्शन का महत्व समझाते हुए श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि वे योग्य, सदाचारी और आध्यात्मिक ज्ञान रखने वाले गुरु का सानिध्य प्राप्त करें। केवल गुरु धारण करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके बताए सत्य, प्रेम, करुणा और सदाचार के मार्ग पर चलना भी आवश्यक है।
सैकड़ों भक्तों की समस्याएं सुनीं, मौके पर बताए उपाय
सत्संग के उपरांत राजर्षि गुरुदेव तेजवीर सिंह खोखर ने सैकड़ों श्रद्धालुओं की समस्याओं को गंभीरता से सुना। भक्तों ने अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक परेशानियां उनके समक्ष रखीं। गुरुदेव ने धैर्यपूर्वक उनकी बातें सुनीं और परिस्थितियों के अनुरूप उन्हें मार्गदर्शन देते हुए मौके पर ही समस्याओं के समाधान के लिए उपाय बताए।
गुरुजी से अपनी बात साझा करने और मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर पाकर श्रद्धालुओं ने श्रद्धा व्यक्त की। गुरुदेव ने उन्हें धैर्य, सकारात्मक सोच, सदाचार और ईश्वर के प्रति विश्वास बनाए रखने की प्रेरणा दी। इस दौरान आश्रम में भक्ति, आस्था और आध्यात्मिकता का वातावरण बना रहा।
भक्ति, सेवा और सदाचार ही जीवन की सच्ची कमाई
बाबा मोहनराम आश्रम में आयोजित इस सत्संग का संदेश स्पष्ट रहा कि मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल धन-संपत्ति जुटाना नहीं, बल्कि अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाना, दूसरों के दुख में सहभागी बनना और परमात्मा के प्रति अपनी श्रद्धा को मजबूत करना है।
राजर्षि गुरुदेव तेजवीर सिंह खोखर ने अपने आध्यात्मिक विचारों के माध्यम से श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि वे गुरु के मार्गदर्शन में जीवन को सदाचार, सेवा और भक्ति से जोड़ें। क्योंकि संसार की संपत्ति यहीं रह जाती है, लेकिन अच्छे कर्म, मानवता और भक्ति से जुड़ी सीख मनुष्य के जीवन को सार्थक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

