पशुपालन और वन विभाग के पास संसाधनों का संकट,कार्मिक परेशान, कोई सुनने वाला नहीं

नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो
अमेठी। पशु पालन विभाग और वन विभाग दोनों विभागों के पास काम बहुत अधिक है,काम के सापेक्ष बजट , उपकरण और स्टाफ नहीं है। तेंदुए के पोस्टमार्टम के दौरान रविवार को चिकित्सकों को खुद से चीर फाड़ के लिए संसाधन के इंतजाम करने पड़े। इसके पहले तेंदुए के रेस्क्यू ऑपरेशन में लगाई गई टीम के पास भी तेंदुए को पकड़ने के लिए जरूरी हथियार और जाल नहीं था।
जिले में 126गोवंश आश्रय स्थल संचालित हैं। इनके संचालन के लिए बजट ग्राम प्रधान और सेक्रेटरी के संयुक्त खाते में आता है। गोवंश आश्रय स्थलों पर संरक्षित गोवंशों के इलाज के लिए पशुपालन विभाग के चिकित्सकों को अलग से बजट नहीं मिलता है। यही कारण है कि गोशालाओं में गोवंशों के बीमार होने पर समुचित इलाज नहीं हो पाता,वे मौत के शिकार हो जाते हैं। पशु चिकित्सालयों में दवाएं संरक्षित गोवंशों की जरूरत के अनुसार उपलब्ध नहीं है।
पैरावेट, फार्मासिस्ट और पशु धन प्रसार अधिकारियों के रूप में मैन पावर की भारी कमी है।
कोट :
पशु चिकित्सालयों को कागज खरीदने तक के पैसे नहीं मिलते हैं। अस्पतालों के लिए कोई अनुरक्षण बजट नहीं मिलता। अस्पताल के रखरखाव का खर्च तैनात पशु चिकित्सा अधिकारी को स्वयं वहन करना पड़ता है। पत्र लिखते रहिए कोई भी सुनने वाला नहीं है।
डा शिवम् गंगवार
उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी, अमेठी



