बालाघाट

दीपक के सरेंडर करने के साथ बालाघाट में ‘लाल सलाम’ को पूर्णविराम

 नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बालाघाट(म0प्र0) :तीन दशक से माओवाद के साये से जूझ रहा बालाघाट ही नही अपीतू मध्यप्रदेश पूरी तरह मुक्त हो गया। माओवाद  का वजूद खत्म करने की अंतिम तारीख मार्च 2026 थी,एक मात्र मलाजखंड एसी के डिप्टी कमांडर एडीवीसीएम रैंक दीपक उर्फ मंगल ऊईके रह गया था। वो भी अपने साथी रोहित एसीएम,दरेकासा एरिया कमिटी के साथ 07 बटालियन सीआरपीएफ कैंप कोरका थाना बिरसा एजिला बालाघाट में आत्मसमर्पण कर दिया है। नक्सली दीपक एक स्टेंगन के साथ सरेंडर किया।
*पुलिस ने लगातार प्रयास की* 
मध्य प्रदेश के बालाघाट के अतिसंवेदनशील पुलिस चौकी सोनेवानी के पालागोंदी का रहने वाला हार्डकोर नक्सली दीपक उर्फ मंगल उईके को आत्मसमर्पण कराने के लिए पुलिस महकमा लगातार प्रयासरत था।माओवादी दीपक नेे देखा कि उसके सभी साथी लगातार आत्मसमर्पण कर रहे हैं। ऐसे में वह भी सरेंडर कर दिया। दरअसल सरकार की पुनर्वास से पुर्नजीवन की और ले जाने वाली नीति ने नक्सलियों का ब्रेन वास किया। इसका असर दीपक पर भी हुआ। पुलिस ने उसके परिजनों पर दबाव बनाया कि वे कहें कि सरेंडर कर दे। जंगल में रहने से कुछ मिलने वाला नहीं। समाज की मुख्यधारा में लौटना ही बेहतर है।
  *साल 1994 में थामी बंदूक* 
पालागोंदी का रहने वाला दीपक उईके परिवार में सबसे बड़ा है और उसके अन्य चार भाई बिसन उईके, रमेश उईके, गणेश उईके और महेश उईके है। परिवार वालों के मुताबिक 1994 में दीपक ने माओवादी विचारधारा से प्रभावित होकर बंदूक थाम लिया था। और तब से वह परिजनों से दूर जंगल में नक्सली दलम में रह रहा था। दीपक उईके का नाम शुरू में मंगल उईके था लेकिन अब वह दलम में दीपक उर्फ सुधाकर उर्फ मेहतर उईके के नाम से जाना जाता है।
 *दीपक की पत्नी पहले ही मारी गयी* 
मुख्यमंत्री डाॅ मोहन यादव ने दो टुक माओवादियों के लिए कहा कि माओवादी सरेंडर कर दें नहीं तो उन्हें मार देंगे।उनकी चेतावनी का असर यह था कि गत दिनों 2 करोड़ 36 लाख के इनामी नक्सलियों ने सरेंडर किया। दीपक उइके की पत्नी सागन की पुलिस मुठभेड़ में पहले ही मारी जा चुकी है।
       *बेटा मुख्यधारा में लौटा* 
लगभग 29 या 30 साल की उम्र से शामिल दीपक के अधिकांश साथियों ने पुलिस के समक्ष सरेंडर कर दिया है या उनकी मौत हो गई है। दीपक की पत्नी सागन की पुलिस मुठभेड़ में मौत से दीपक मानसिक रूप से टूट गया था। वहीं उसका बेटा संतोष दलम छोड़कर घर लौट जाने से उसे मानासिक रूप से धक्का लगा। संतोष अब पालागोंदी गांव को छोड़कर छत्तीसगढ़ रहने चले गया है। एक तरह से पालागोंदी में दीपक का अब कोई आवास व परिवार नहीं रहा है। मगर चार भाई और उनका पूरा परिवार जरूर यहां पर निवासरत है।
अब बालाघाट नक्सल मुक्त
बालाघाट एसपी आदित्य मिश्रा के मुताबिक लगातर फोर्स के दबाव में आकर नक्सलियों ने लाल गलियारा छोड़ना अपने लिए बेहतर समझा। वैसे भी सरकार की नक्सलियों के लिए पुनर्वास नीति ने उन्हें मानासिक रूप से तैयार किया और वो समाज की मुख्य धारा में लौटे। यह बालाघाट के लिए आज ऐतिहासिक दिन है और यादगर का पल की अब बालाघाट नक्सल मुक्त हो गया,यानी अब मध्यप्रदेश में रेड हंट का दौर खत्म हो गया। नक्सलियों ने पुनर्वास से पुनर्जीवन तक सरकार की नीति से प्रभावित होकर आत्मसमर्पण किया है।
          *MMC जोन प्रभारी रामधेर मज्जी भी शामिल* 
अभी तक आत्मसमर्पण करने वालों में एमएमसी जोन प्रभारी रामधेर मज्जी ने भी एक 47 राइफल सौंपकर समर्पण किया। उनकी गार्ड और हार्डकोर नक्सली मानी जाने वाली सुनीता ओयाम कुछ वक्त पहले ही बालाघाट पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर चुकी थी। सरेंडर करने वाले माओवादियों ने 12 हथियार सौंपे। जिनमें दो एके47 दो इंसास, एक एसएलआर और दो 303 राइफलें शामिल हैं।
सरेडर करने वाले प्रमुख नक्सली
सरेंडर करने वाले प्रमुख नक्सलियों में चंदू उसेंडी डीवीसीएम, ललिता डीवीसीएम, जानकी डीवीसीएम, प्रेम डीवीसीएम, राम सिंह दादा,एसीएम, सुकेश पोट्टम,एसीएम, लक्ष्मी पीएम, शीला पीएम, सागरपीएम, कविता पीएम और योगिता पीएम शामिल हैं। सभी नक्सलियों ने पुनर्वास योजना के तहत सरेंडर किया है। उन्हें राज्य सरकार की मौजूदा पुनर्वास नीति के तहत आर्थिक सहायता कौशल विकास प्रशिक्षण और सामाजिक पुर्न स्थापन का आश्वासन दिया गया है।
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