भरत पुर

भुसावर में बर्षो से चली आ रही परम्परा का हुआ निर्वाहान

युवाओं एवं बच्चों ने रंग- बिरंगे डन्डे बजाकर मनाई डन्डा चौथ (गणेश चतुर्थी)

डन्डा चौथ बर्ष में आई सब बच्चों को लड्डू लाई जैसे मंगलमय गीतों से गुन्जयमान हुआ भुसावर क्षेत्र
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
भुसावर : हमारे भारत देश में अनेकानेक त्यौहार हिन्दू पंचांग के अनुसार और विभिन्न रीति-रिवाज के साथ समय-समय पर मनाए जाते हैं। उन्हीं त्यौहारों में से एक है,, डन्डा चौथ। जहां हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद यानी भादो मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भगवान गणेश का जन्म हुआ था। गणेश जी के जन्म दिवस को ही गणेश चतुर्थी कहा जाता है। वही मान्यता के अनुसार गुरु शिष्य की परंपरा के तहत गणेश चतुर्थी डन्डा चौथ के दिन से ही विद्याध्ययन का शुभारम्भ हुआ था। वही ब्रज क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले भरतपुर जिले के ऐतिहासिक शहरों में शामिल भुसावर शहर सहित उपखण्ड मुख्यालय क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में गणेश चतुर्थी पर्व को डन्डा चौथ के नाम से भी जाना जाता है। जहां आज भी युवक एवं बच्चे बरसों से से चली आ रही परम्परा का निर्वाहान करते हुए दोनों हाथों में छोटे-छोटे रंग-बिरंगे डन्डे लेकर अपने दोस्तों के साथ टोलिया बनाकर आपस में डन्डे बजा कर अपनी अपनी गली, मौहल्ले के घर-घर जाकर सामूहिक गीत डन्डा चौथ बरस में आई सब बच्चों को लड्डू लाई,, खैर खड़ी की खैर खड़ी सासु छोटी बहू बड़ी और इन्दर राजा पानी दे पानी दे धानी दे गुडधानी दे आदि जैसे मंगलमय गीत गाते हुए नजर आए। वहीं इन युवाओं और बच्चों की मस्ती से डन्डा चौथ (गणेश चतुर्थी) पर्व का अलग ही माहौल हो गया। वहीं घरों से इन युवाओं और बच्चों को उपहार स्वरूप रूपए, पैसे,अन्नदान, गुडधानी देकर इनका हौसला बढाते हुए भगवान गणेश जी से परिवार में सुख- शान्ति, समृद्धि एवं विश्व कल्याण की मनोकामनाएं मांगी गई। वहीं बुजुर्ग कुन्जीलाल शर्मा, टिल्लाराम, चेतराम और कल्याण प्रसाद ने जानकारी देते हुए बताया कि उन दिनो करीब 50, साठ वर्ष पूर्व गणेश चतुर्थी के पर्व को ग्रामीण परिक्षेत्र की भाषा में डंडा चौथ के रूप में ज्यादा जानते थे और मानते थे। लेकिन इन युवाओं और बच्चों के सराहनीय प्रयास है जो बरसों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। वहीं अब समय के साथ-साथ डन्डा चौथ को गणेश चतुर्थी पर्व के नाम से जाना जाता है। जहां डन्डा चौथ गणेश चतुर्थी के दिन अस्थाई मिट्टी से बने गणेश जी की प्रतिमा की स्थापना के साथ शुरू होता है और अनंत चतुर्दसवीं तक चलता है। वही अनंत चतुर्दशी को गणेश जी की अस्थाई प्रतिमा को शुद्ध जल, सरोवर, नदी आदि में नाम आंखों के साथ गणपति बप्पा मोरया अगले बरस तू जल्दी आ के जयकारों के साथ विसर्जन किया जाता हैं।
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