असम के दक्षिण कमरूप के मिर्जा में भारतीय इतिहास संकलन समिति
असम का 36वां राज्य अधिवेशन और राष्ट्रीय चर्चा चक्र सफलतापूर्वक संपन्न।

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
असम : भारतीय इतिहास संकलन समिति, असम का 36वां राज्य अधिवेशन असम के कमरूप जिले के इतिहास प्रसिद्ध मिर्जा स्थित दक्षिण कमरूप महाविद्यालय परिसर में 3 और 4 जनवरी को दो दिवसीय आयोजित होकर सफलतापूर्वक समाप्त हो गया। दक्षिण कमरूप जिला समिति के उद्यम से तथा दक्षिण कामरूप महाविद्यालय एवं दक्षिण कामरूप सौवाली महाविद्यालय के सौजन्य से आयोजित इस अधिवेशन का शुभारंभ राज्य अध्यक्ष डॉ. गजेंद्र अधिकारी ने समिति का ध्वज फहराकर किया। डॉ. जूरी भारत कलिता, राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडे तथा राष्ट्रीय महासचिव हेमंत धिंग मजूमदार ने प्रयात कार्यकर्ताओं को श्रद्धांजलि अर्पित की। 3 जनवरी को अधिवेशन का शुभ उद्घाटन मंगलदई के सांसद तथा भारतीय जनता पार्टी, असम के अध्यक्ष दिलीप सैकीया ने किया। प्रदर्शनी का उद्घाटन समिति की राज्य कार्यकारी अध्यक्ष जुला शर्मा ने किया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, भारतीय ज्ञान परंपरा और इतिहास विषयक विशेष चर्चा चक्र में असम के 10 विश्वविद्यालयों के सन्माननीय उपाचार्य एवं 30 महाविद्यालयों के प्राचार्य सहित अनेक विद्वानों ने भाग लिया। इतिहास बर्ता बक्सा जिला विशेषांक, डॉ. नीलांजन दे रचित नेताजी सुभाष चंद्र पर एक ग्रंथ, डॉ. जाह्नवी देवी द्वारा संपादित अधिवेशन स्मारिका “कामरूप प्रभा” तथा मीनाक्षी बरा रचित एक ग्रंथ का विमोचन भी हुआ। दोनों दिनों में अनेक सत्र एवं चर्चा चक्र आयोजित किए गए। साथ ही 3 जनवरी की संध्या सुधाकंठ डॉ. भूपेन हजारिका एवं दर्दी शिल्पी, असमिया के दिलों की धड़कन जुबिन गार्ग के स्वरचित्रण में सांस्कृतिक अनुष्ठान का आयोजन किया गया। दक्षिण कामरूप क्षेत्र के सांस्कृतिक तत्वों का विशेष प्रदर्शन करने वाली इस सांस्कृतिक संध्या के मंच का उद्घाटन अमृत कंठ जुबिन गार्ग के चाचा मनोज बरठाकुर ने किया। राज्य के विभिन्न प्रांतों के नये-नये इतिहासकारों ने इस अधिवेशन में विभिन्न विषयों पर कुल 57 शोध पत्र प्रस्तुत किए। 4 जनवरी के समापन अनुष्ठान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य उल्लास कुलकर्णी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होकर असमिया में भाषण प्रदान किया। अपने भाषण में कुलकर्णी ने असम तथा उत्तर-पूर्वांचल के कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य व्यक्त करने के साथ ही प्राचीन उत्तर-पूर्व भारत में इस्लामिक आक्रमण एवं ब्रिटिश शासन द्वारा किए गए अन्याय का उल्लेख करते हुए इतिहासविदों को इन विषयों पर गहन अध्ययन कर आगे बढ़ने का आह्वान किया।



