जालौन
उरई विकास प्राधिकरण की कथित वसूली का खेल! कोई पास कोई फेल?
आठ साल बाद नींद से जागा ओडीए महकमा, जड़ा ताला

नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
उरई (जालौन)। उरई विकास प्राधिकरण (ओडीए) एक बार फिर विवादों के घेरे में है। विकास या विकास के नाम पर कार्रवाई और वसूली के आरोपों के बीच आज सुबह हुई एक घटना ने आम जनता के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सुबह-सुबह ओडीए की टीम, जिसमें सचिव परमानंद यादव और वरिष्ठ कोषाधिकारी आशुतोष चतुर्वेदी भरी पुलिस बल के साथ, मंशापूर्ण मंदिर के पास शहर के एक प्रमुख शोरूम ‘एलेन सॉली’ जो कि बजरंग होटल में स्थित है पहुंची और वहां ताला डाल दिया। इसके ठीक सामने स्थित चंद्रकांत विला पर भी इसी तरह की कार्रवाई की गई। अधिकारियों ने कारण बताया कि संबंधित निर्माण का नक्शा पास नहीं है। हालांकि इस कार्रवाई ने व्यापारियों और आम लोगों को चैंका दिया। सवाल यह उठ रहा है कि यदि नक्शा पास नहीं था, तो निर्माण कार्य को पहले ही क्यों नहीं रोका गया? जब भवन पूरी तरह बन गया, दुकानें 8 साल से संचालित हो रही है, तब अचानक ताला डालने की कार्रवाई क्या दर्शाती है? सोता हुआ विभाग जाग गया या खेल कुछ और है। स्थानीय व्यापारियों का आरोप है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। शहर में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहां पहले नोटिस दिया जाता है, फिर अचानक सीलिंग की कार्रवाई होती है, और बाद में किसी न किसी तरीके से मामला शांत हो जाता है। इससे यह धारणा बन रही है कि विकास प्राधिकरण की कार्रवाई पारदर्शी नहीं है। विकास के नाम पर कथित वसूली से व्यापारी वर्ग पहले ही परेशान बताया जा रहा है। हाईवे किनारे चल रहे कई निर्माण कार्य भी इसी कारण रुक गए हैं। उद्योग व्यापार मंडल ने इस कार्रवाई का विरोध जताया और इसे मनमानी बताया। घटना उस समय और नाटकीय हो गई जब शोरूम के मालिक अंजनी दुबे उर्फ बबलू दुबे विरोध स्वरूप सड़क पर बैठ गए। उन्होंने कपड़े फाड़कर पेट्रोल डालने तक की कोशिश की, जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया। स्थिति बिगड़ती देख प्रशासन हरकत में आया और आनन-फानन में दुकान का ताला खुलवा दिया गया। यह पूरी घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है क्या ओडीए की कार्रवाई नियमों के तहत हो रही है या चयनात्मक रूप से? क्या नोटिस केवल दबाव बनाने का माध्यम बन चुके हैं? और सबसे अहम, क्या बिना “लेन-देन” के किसी भी मामले का समाधान संभव नहीं रह गया है? सूत्रों के अनुसार, शहर के कई अन्य प्रतिष्ठान चाहे वह संजय बुक डिपो वालों का होटल हो, रूसिया फर्नीचर शोरूम या दिवौलिया पेट्रोल पंप एवं अन्य व्यावसायिक संस्थान भी इसी तरह के नोटिसों और दबाव का सामना कर रहे हैं। आरोप यह भी है कि कई मामलों में वर्षों तक नोटिस लंबित रहते हैं, लेकिन कार्रवाई केवल उन्हीं पर होती है जो कथित तौर पर “सहयोग” नहीं करते। उरई की आम जनता और व्यापारी अब यह जानना चाहते हैं कि विकास प्राधिकरण का असली उद्देश्य क्या है, वास्तविक विकास या फिर विकास के नाम पर दबाव और वसूली? इस पूरे प्रकरण ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है और निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो रही है।
कैसे होता है नोटिस का खेल
उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम 1973 की धारा 27 की उप धारा (1) के अधीन उरई विकास प्राधिकरण पहले कारण बताओं नोटिस जारी करता है जिसमें धमकाने के लिए लिखा रहता है कि उत्तर प्रदेश नगरी योजना एवं विकास अधिनियम 1973 की धारा 14 एवं धारा 15 के आदेश अनुसार विकास प्राधिकरण की अनुज्ञा प्राप्त किए बिना उक्त निर्माण कार्य किया गया है और एक तारीख निहित कर दी जाती है जिसमें आपको उरई विकास प्राधिकरण में जाकर अपना पक्ष रखना होता है और नोटिस में यह भी लिखा होता है कि क्यों न आपका पूर्व में किया गया निर्माण गिरा देने का आदेश पारित कर दिया जाए जिससे आदमी घबरा जाता है और सीधा विकास प्राधिकरण पहुंच जाता है वहां शुरू होता है वसूली का खेल अगर आप वहां के वरिष्ठ अधिकारियों को संतुष्ट कर देते हैं तो वह नोटिस वहीं दब जाता है नहीं तो तीन-चार महीने के अंदर ही आपकी बिल्डिंग सीलिंग की कार्रवाई पक्की समझो।
ओडीए के एरिया को सात जौन में किया गया विभाजित
उरई विकास प्राधिकरण ने विकास प्राधिकरण क्षेत्र के अंदर आने वाले 32 गांव एवं उरई शहर को 7 जोन में बांटा गया है जिसमें शहर के मुख्य दो जोन वरिष्ठ कोषाधिकारी आशुतोष त्रिवेदी के पास है जबकि ओडीए के पांच क्षेत्र ओडीए के सचिव परमानंद यादव के पास है। ओडीए को सात जौन में विभाजित कर दिया गया है। जिसमें यदि किसी जौन में कोई भी कार्यवाही या फिर नोटिस ओडीए द्वारा जारी किये जाते हैं उनमें संबंधित दो अधिकारियों से ही संपर्क कर उसका समाधान किया जा सकता है।


