गोड्डा

टूटा हुआ कुर्सी के सहारे चल रहा है, दिव्यांग लड़के का जीवन

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बसंतराय। बसंतराय प्रखंड क्षेत्र के महेशपुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो विकास के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। यहां एक छोटा सा बच्चा, महज 20 रुपये में टूटी हुई कुर्सी वह भी कबाड़ी वाले के पास से खरीद कर कुर्सी के सहारे अपना जीवन जीने को मजबूर है। 20 रुपये की टूटी कुर्सी, जो उसके लिए चलने – फिरने का एकमात्र सहारा बन गई है। जरा सोचिए, एक तरफ सरकारें विकास के बड़े-बड़े दावे करती हैं, योजनाओं की लंबी सूची गिनाई जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। इस बच्चे की मजबूरी देखकर हर कोई हैरान है। यह सिर्फ एक बच्चा नहीं, बल्कि उस सिस्टम की सच्चाई है, जो कागजों में तो बहुत आगे है, लेकिन जमीन पर कहीं पीछे छूट चुका है।
स्थानीय लोगों की मानें तो क्षेत्र में कई दिव्यांग लोग हैं, जिन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ आज तक नहीं मिला। सरकार की तरफ से दिव्यांगों के लिए ट्राई साइकिल, पेंशन और अन्य सुविधाओं की बात की जाती है, लेकिन महेशपुर में हालात ऐसे हैं कि एक जरूरतमंद को ट्राई साइकिल तक नसीब नहीं हो रही। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जब आप प्रखंड कार्यालय की ओर रुख करते हैं, तो वहां ट्राई साइकिल धूल फांकती हुई नजर आती हैं। यानी, जो सुविधा जरूरतमंदों तक पहुंचनी चाहिए, वह दफ्तरों में ही पड़ी रह जाती है। ये दृश्य साफ तौर पर बताता है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं बड़ी लापरवाही है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर जब सरकार संसाधन दे रही है, तो फिर यह जरूरतमंदों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा? क्या यह सिस्टम की कमी है, या फिर जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता? आखिर क्यों एक दिव्यांग व्यक्ति को टूटी हुई कुर्सी के सहारे अपनी जिंदगी गुजारनी पड़ रही है? इस पूरे मामले ने स्थानीय प्रशासन पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार आवेदन देने के बावजूद भी कोई सुनवाई नहीं होती। नतीजा यह है कि लोग मजबूरी में खुद ही अपने लिए रास्ता तलाशने को विवश हैं।
यह घटना सिर्फ महेशपुर की नहीं है, बल्कि यह उस हकीकत को दिखाती है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जरूरत है कि इस मामले को गंभीरता से लिया जाए और जल्द से जल्द जरूरतमंदों तक सुविधाएं पहुंचाई जाएं।
अब देखने वाली बात यह होगी कि इस खबर के सामने आने के बाद प्रशासन क्या कदम उठाता है। क्या उस बच्चे को उसका हक मिलेगा? क्या दिव्यांगों को ट्राई साइकिल और अन्य सुविधाएं मिल पाएंगी? या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह सिर्फ खबर बनकर रह जाएगा? फिलहाल, यह तस्वीर हम सभी को सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर असली विकास किसे कहते हैं… और क्या वाकई विकास जमीन तक पहुंच पा रहा है या नहीं।
Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button