झुंझुनू
उदयपुरवाटी के प्रबुद्ध जनों की मांग हर बच्चा-बड़ा जाने पेड़-पौधे का नाम
पौधे चाहिए कम लगाओ, रोपित पौधे को वृक्ष बनाने में जुट जाओ

सरकार से मांग :- हर तहसील पर खुले मिट्टी परीक्षण केंद्र
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
झुंझुनूं। पर्यावरण अभियान का अंतिम चरण चल रहा है। राज्य भर में वर्षों से हर साल कई लाख पौधे रोपित किए जाते हैं। उदयपुरवाटी के वरिष्ठ पत्रकार सज्जन कुमार सिंह उर्मिल और अन्य वृक्ष प्रेमियों का कहना है कि अधिकतर लोग देखा-देखी में पौधारोपण करते हैं ताकि मीडिया और सोशल मीडिया में उनके समाचार, फोटो और रील आती रहें। हकीकत यही है कि 10-20% लोग ही सच्चे मन से पौधारोपण करते हैं और पौधे को वृक्ष बनने तक संरक्षण देते हैं। इसी वजह से हर साल पनपते वृक्षों में सिर्फ 10-20% की ही वृद्धि हो पा रही है। दशकों के अभियान के बाद भी हर शहर, कस्बे, गांव, पहाड़ों पर पेड़-पौधे इतनी संख्या में नहीं दिख रहे। होना तो यह चाहिए कि लोगों को पौधारोपण के लिए जमीन पर जगह खोजनी पड़े। वृक्षों में तेजी से वृद्धि के लिए प्रबुद्ध जनों और वृक्ष प्रेमियों तथा पर्यावरण संरक्षणकों का कहना है कि लोगों में जोधपुर रियासत के बिश्नोइयों जैसा जज्बा पैदा करना होगा। धरातल पर सही भूमिका निभानी होगी। पौधारोपण से पहले यह जानना जरूरी है कि उस स्थान की मिट्टी, वातावरण और जलवायु कैसी है। सामान्य लोगों को इसका ज्ञान नहीं है। इसलिए प्रबुद्ध जनों और वृक्ष प्रेमियों तथा पर्यावरण संरक्षणकों ने मांग की है कि राज्य सरकार हर तहसील स्तर पर मिट्टी परीक्षण केंद्र खुलवाने का त्वरित प्रयास करे। इससे फसलों के उत्पादन में भी वृद्धि होगी और पेड़-पौधों की संख्या में सार्थक वृद्धि होगी। होड़-होड़ी में पौधारोपण करना पेड़ों की संख्या बढ़ाने का सार्थक पहलू नहीं है।पेड़-पौधे हमारे जीवनदाता हैं और किसान हमारा अन्नदाता है। हमारे पूर्वज बिना नाम-फोटो की परवाह किए रास्ते किनारे बरगद, पीपल, नीम, गूलर, गूंदी, इमली जैसे वृक्ष लगाते थे जो आज 40-50 साल बाद भी खड़े हैं। उनका मूल मंत्र था चाहे कम लगाओ, किंतु विकसित होने तक उसे बचाओ। तीन महीने के सर्वेक्षण में पत्रकार सज्जन कुमार सिंह उर्मिल ने करीब सौ पेड़-पौधों, लताओं और औषधीय पौधों के स्केच बनाए और उनके नाम भी खोजे। यह जानकर हैरानी हुई कि लोग अपने घर, विद्यालय, कार्यालय के आसपास लगे पेड़ों के नाम तक नहीं जानते। यह स्थिति चिंताजनक है। इसी को देखते हुए प्रबुद्ध जनों और वृक्ष प्रेमियों तथा पर्यावरण संरक्षणकों ने सुझाव दिया है कि रोड़ साइड, कार्यालय और संस्थानों में हर पेड़ पर नाम-पट्टिका लगाई जाए जिसमें अनुमानित आयु, पेड़ का प्रकार, गुणधर्म और वृक्ष क्रमांक हो। नए रोपित पौधों पर रोपण की तिथि, माह और सन् लिखा जाए। साथ ही यह भी कहा गया है कि जो पौधा हर साल पनपकर 10 साल में वृक्ष बने, उसे रोपित करने वाला व्यक्ति या समूह हर साल उसका वृक्ष जन्मदिन मनाए और हर जन्मदिन पर एक नया पौधा लगाए। ऐसे लोगों को राष्ट्रीय दिवसों पर सम्मानित किया जाए। हर पांच साल बाद सरकार पंचायत, तहसील और जिला स्तर पर वृक्ष गणना करवाए ताकि देश में हर प्रदेश की वन संपदा के वास्तविक आंकड़े सामने आ सकें। प्रबुद्ध जनों और वृक्ष प्रेमियों तथा पर्यावरण संरक्षणकों का मानना है कि यदि सरकार को मिट्टी परीक्षण केंद्र आदि खोलने में एक-दो साल से अधिक अवधि लग सकता है, तो वनस्पति विज्ञान, कृषि विज्ञान, आयुर्वेद विज्ञान और वन विभाग आदि की पढ़ाई करने जा रहे विद्यार्थियों के लिए पेड़-पौधों के नाम और उनकी सम्पूर्ण जानकारी की वेबसाइट तुरंत शुरू की जा सकती है। इससे उन्हें एक-दो साल पहले ही अतिरिक्त जानकारी हासिल हो जाएगी। साथ ही विश्व पर्यावरण दिवस मनाने जैसा ही विश्व पौधारोपण और संरक्षण दिवस मनाने पर भी विचार किया जा सकता है। यह सीखने की अवश्य कोशिश करते रहना चाहिए कि जो मानव व अन्य प्राणियों के जीवन के आधार है। उनके बारे में जितना अधिक ज्ञान होगा तो हर व्यक्ति और प्राणियों के स्वास्थ्य व आयु वृद्धि के आंकड़ों में आशातीत वृद्धि होगी और प्रति व्यक्ति की आय में भी वृद्धि होने से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। चिकित्सालयों में रोगियों की लंबी कतारों में भी छंटनी दिख सकती है। स्वास्थ्य सेवाओं के सालाना बजट में भी बचत की संभावना बन सकती है। बिना मांगे पेड़-पौधे देते हैं हम को सब कुछ।


