नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : समाज में बढ़ते अंधविश्वास, भाग्यवाद और जन्म आधारित भेदभाव के बीच वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक मूल्यों को लेकर बहस तेज हो रही है। सवाल उठ रहा है कि व्यक्ति का भविष्य ग्रह-नक्षत्र और भाग्य तय करेंगे या उसकी शिक्षा, मेहनत, स्वास्थ्य, कौशल और सामाजिक-आर्थिक अवसर।
ज्योतिष में ग्रहों, नक्षत्रों और राशियों की स्थिति के आधार पर व्यक्ति के स्वभाव और भविष्य को लेकर दावे किए जाते हैं। वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण किसी भी दावे को प्रमाण, परीक्षण और दोहराए जा सकने वाले परिणामों की कसौटी पर परखता है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध में ज्योतिषीय भविष्यवाणियों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित करने वाला विश्वसनीय और पुनरुत्पाद्य आधार स्थापित नहीं हुआ है। ऐसे में ज्योतिष को निजी या सांस्कृतिक आस्था मानना अलग विषय है, लेकिन उसे वैज्ञानिक सत्य के रूप में प्रस्तुत करना अलग विषय है।
भाग्यवाद को लेकर भी सामाजिक स्तर पर सवाल उठते रहे हैं। जब गरीबी, सामाजिक स्थिति, सफलता या असफलता को व्यक्ति के प्रयास और परिस्थितियों के बजाय भाग्य अथवा पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम बताया जाने लगे तो इससे व्यक्ति की अपने हालात बदलने और अधिकारों के लिए आवाज उठाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, भारत की गुलामी को केवल ज्योतिष या धार्मिक मान्यताओं का परिणाम बताना इतिहास का सरलीकरण होगा। राजनीतिक विखंडन, सैन्य और आर्थिक परिस्थितियां, औपनिवेशिक विस्तार, व्यापारिक हित और विभिन्न राजनीतिक शक्तियों की भूमिका समेत कई कारण इसके पीछे रहे हैं।
भारत में जन्म आधारित सामाजिक ऊंच-नीच और अस्पृश्यता ने लंबे समय तक समाज के बड़े वर्ग को समान अवसरों से दूर रखा। इसे केवल ज्योतिष का परिणाम नहीं कहा जा सकता। इसके पीछे सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों की लंबी प्रक्रिया रही है। भारतीय संविधान ने इस व्यवस्था को चुनौती देते हुए समानता को आधार बनाया। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 15 धर्म, जाति आदि के आधार पर भेदभाव के निषेध और अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के उन्मूलन की व्यवस्था करता है। अस्पृश्यता से जुड़ी सामाजिक निर्योग्यताओं के खिलाफ Protection of Civil Rights Act, 1955 में भी प्रावधान हैं।
वैज्ञानिक सोच को मजबूत करने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। बच्चों और युवाओं को केवल परीक्षा और नौकरी तक सीमित शिक्षा देने के बजाय उनमें सवाल पूछने, प्रमाण तलाशने, तर्क करने और सही-गलत की जांच करने की क्षमता विकसित करना जरूरी है। संविधान के अनुच्छेद 51A(h) में प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बताया गया है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा जिज्ञासा और सुधार की भावना विकसित करे।
किसी देश की वास्तविक ताकत उसके मानव संसाधन में होती है। नागरिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, रोजगार, वैज्ञानिक सोच और आर्थिक अवसर ही देश की प्रगति का आधार बनते हैं। किसी बच्चे का भविष्य उसकी जाति, धर्म, परिवार या जन्म-कुंडली के बजाय उसे मिलने वाली शिक्षा और अवसरों से तय होना चाहिए। गरीबी को केवल भाग्य का परिणाम मानने के बजाय रोजगार, शिक्षा, आर्थिक नीतियों और सामाजिक सुरक्षा से जोड़कर देखने की जरूरत है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार के कामकाज का आकलन भी ग्रहों, भाग्य या दैवी कृपा से नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कानून-व्यवस्था, नागरिक अधिकार और आर्थिक विकास जैसे वास्तविक मानकों से किया जाना चाहिए। किसी राजनीतिक दल, नेता, विचारधारा या संस्था को सवालों और प्रमाण से ऊपर नहीं रखा जाना चाहिए।
ज्योतिष या धार्मिक मान्यताओं में किसी व्यक्ति का निजी विश्वास होना अलग विषय है। लोकतांत्रिक समाज में निजी आस्था का सम्मान करते हुए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि किसी भी आस्था को वैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत कर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार या सामाजिक समानता पर थोपा न जाए।
भारत की वास्तविक प्रगति का रास्ता सवाल पूछने, प्रमाण तलाशने, शिक्षा हासिल करने, समानता स्वीकार करने और संविधान में दिए अधिकारों की रक्षा करने से होकर गुजरता है। भाग्य पर निर्भर नागरिक के बजाय अधिकारों से संपन्न नागरिक, जन्म से निर्धारित ऊंच-नीच के बजाय समान नागरिकता और निरंकुश सत्ता के बजाय संवैधानिक लोकतंत्र ही आधुनिक भारत के विकास की मजबूत नींव बन सकते हैं।

