नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : रविवार को लोनी की सियासत में दो अलग-अलग मंच सजे और दोनों जगह समर्थकों का हुजूम नजर आया। एक ओर सिरौली गांव में भाजपा विधायक नंदकिशोर गुर्जर के समर्थन में पंचायत हुई तो दूसरी ओर रिस्तल में अनिल कसाना के समर्थन में पंचायत का आयोजन हुआ। दोनों मंचों से बढ़चढकर अपने-अपने दावे किए गए और दोनों तरफ भीड़ को अपने पक्ष की ताकत बताया गया।
लेकिन भीड़ के इस मुकाबले के बीच असली सवाल यह है कि कौन सिर्फ भीड़ का आंकड़ा गिन रहा है और कौन सवालों के जवाब देने को तैयार है?
रिस्तल की पंचायत में अधिवक्ता महकार कसाना ने विधायक नंदकिशोर गुर्जर की राजनीति और उनके राजनीतिक सफर को लेकर सीधे और तीखे सवाल उठाए। सवालों में न मिठास थी और न ही राजनीतिक शिष्टाचार की औपचारिक चाशनी बल्कि सवाल सीधे निशाने पर थे।
अब सवाल पूछने वालों से सवाल करने की राजनीति भी खूब चल रही है। ऐसे में जनता का सीधा सवाल है अगर सवाल गलत हैं तो जवाब देने में हिचक कैसी? और यदि सवाल ही षड्यंत्र हैं तो उनके जवाब इतने मुश्किल क्यों?
रेड फ्लेम रेस्टोरेंट प्रकरण को लेकर भी घटनाक्रम और बयानों पर सवाल उठ रहे हैं। विधायक की ओर से कथित रूप से कहा गया कि सूचना मिलने पर वह मौके पर पहुंचे थे। ऐसे में सवाल यह है कि यदि प्रेस वार्ता में हथियारबंद लोगों की मौजूदगी की सूचना थी तो लोनी पुलिस और खुफिया तंत्र को इसकी भनक पहले क्यों नहीं लगी?
अब एक और सवाल यह उठता है कि होटल के सामने पुलिस चौकी होने के बावजूद सूचना मिलने के बाद पुलिस टीम मौके पर पहुंचने में क्यों पीछे रह गई? और जब लोनी बॉर्डर थाना प्रभारी मौके पर पहुंचे, तब यदि हथियारबंद लोगों की मौजूदगी की बात सही थी तो उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई और वह किसके संरक्षण के चलते कानूनी कार्रवाई होने से बच गए?
यहीं से कहानी में एक और ‘रोचक मोड़’ आता है यदि हथियारबंद लोग थे तो वे इतनी आसानी से निकल कैसे गए? क्या पुलिस को इसकी जानकारी थी, या फिर पुलिस को जानकारी ही नहीं थी? दोनों स्थितियां अपने-अपने सवाल खड़े करती हैं।
कुछ लोग इसे राजनीतिक बयानबाजी बता रहे हैं, तो कुछ का सवाल है कि कहीं इस पूरे विवाद से जुड़े मुद्दों से जनता का ध्यान दूसरी तरफ तो नहीं मोड़ा जा रहा?
और सबसे गंभीर सवाल क्या मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों की जवाबदेही और भूमिका की भी जांच होनी चाहिए? जो आरोप हथियार बंद होने के विधायक जी लगा रहे हैं फिर ऐसे लोगों को पुलिस क्यों बचाने में लगी हुई है, बल्कि अब इन सवालों का जवाब कैसे मिलेगा इसकी सच्चाई पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
विडंबना यह है कि घटना के बाद इससे जुड़े बयान तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। ऐसे में जनता के सामने सवाल है कि विधायक मामले में सही बयानबाजी करते हुए घटना सच बता रहे है तो इस मामले में पुलिस अभी तक हाथ पर हाथ धरे हुए क्यों बैठी हुई है जब लोनी में पुलिस विधायक की बातों को त्व्वजो नहीं दे रही तो आम आदमी की सुनवाई कैसे होती होगी। उत्तर प्रदेश की पुलिस की कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट ने भी अपनी तल्ख टिप्पणी की है
लोनी में फिलहाल दो महापंचायतों ने शक्ति प्रदर्शन का संदेश जरूर दे दिया है। मगर लोकतंत्र में आखिरकार फैसला भीड़ के आकार से नहीं, सवालों के जवाब और तथ्यों की जांच से होता है।
अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में सियासत की यह महापंचायत सवालों का जवाब देती है या सवाल पूछने वालों को ही कटघरे में खड़ा करती रहती है।


