
10 से 15 प्रतिशत कथित कमीशन का दबाव? बिना काम भुगतान की शिकायतों ने बढ़ाई बेचैनी; कमिश्नर की कथित धौंस से ठेकेदार खामोश, आखिर किसके इशारे पर चल रहा नगर निगम का सिस्टम?
नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
सिंगरौली। नगर पालिक निगम सिंगरौली में इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा चर्चा भुगतान के कथित खेल की है।ठेकेदारों के भुगतान को लेकर निगम के भीतर से लेकर बाहर तक सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों की मानें तो कई ठेकेदारों का भुगतान चार से पांच माह से अटका पड़ा है। काम पूरा होने के बाद भी भुगतान के लिए फाइलें दौड़ रही हैं और ठेकेदार कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर भुगतान की राह में ऐसा कौन सा रोड़ा है, जो महीनों से हटने का नाम नहीं ले रहा?
नगर पालिका निगम सिंगरौली में कार्य कर रहे संविदा कारों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ठेकेदारों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा कथित 10 से 15 प्रतिशत कमीशन को लेकर है। आरोप है कि भुगतान की प्रक्रिया में कथित कमीशन की मांग पूरी नहीं होने पर फाइलों की रफ्तार सुस्त पड़ जाती है। हालांकि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है यह तो जिम्मेदार अधिकारी ही जानते हैं लेकिन यदि यह बात जांच में सही निकलती है तो नगर निगम की पूरी कार्यप्रणाली कटघरे में खड़ी हो सकती है।ठेकेदारों का तर्क है कि निर्माण सामग्री, मजदूरी और अन्य खर्च तत्काल करने पड़ते हैं, लेकिन भुगतान महीनों तक अटका रहे तो पूरा आर्थिक बोझ ठेकेदार पर आ जाता है। सवाल यह भी है कि यदि कार्यों की गुणवत्ता और दस्तावेज सही हैं तो भुगतान में इतनी लंबी देरी क्यों? क्या फाइलों में कोई तकनीकी खामी है या फिर मामला कहीं और अटक रहा है?
बिना काम भुगतान की चर्चा ने बढ़ाई सनसनी
संविदाकारों के आरोप में कितनी सच्चाई है यह तो हम नहीं जानते लेकिन जो आरोप लगाए जा रहे हैं। वह बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। बताया जाता है कि नगर निगम के कुछ वार्डों में ऐसे कार्यों को लेकर भी चर्चाएं हैं, जिनमें मौके पर अपेक्षित निर्माण दिखाई नहीं देने के बावजूद भुगतान किए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। यदि यह सच है तो मामला महज भुगतान विवाद नहीं, बल्कि सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग का बन जाता है। ऐसे कार्यों का मौके पर भौतिक सत्यापन और भुगतान से पहले तथा बाद की तस्वीरों का मिलान कराया जाए तो स्थिति साफ हो सकती है।
कमिश्नर की कथित धौंस या सिस्टम का दबाव?
ठेकेदारों के बीच यह भी चर्चा है कि निगम के शीर्ष स्तर से कथित दबाव के चलते कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। सवाल यह है कि यदि व्यवस्था पारदर्शी है तो ठेकेदारों को अपनी शिकायत सार्वजनिक करने में डर क्यों महसूस हो रहा है? क्या अधिकारी-कर्मचारी व्यवस्था के खिलाफ बोलने वालों पर कार्रवाई का भय दिखाया जाता है? इन सवालों का जवाब निगम प्रशासन को देना चाहिए।
दो प्यादों के भरोसे पूरी व्यवस्था?
नगर निगम के कामकाज को लेकर यह भी आरोप-चर्चा है कि कमिश्नर कुछ चुनिंदा लोगों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हैं और महत्वपूर्ण कामकाज उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रहा है। यदि यह स्थिति सही है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि करोड़ों रुपये के बजट और सैकड़ों विकास कार्यों वाले नगर निगम की व्यवस्था आखिर कितने लोगों के भरोसे चल रही है? मामले की निष्पक्ष जांच के लिए पिछले छह माह में किए गए सभी निर्माण कार्यों, स्वीकृत राशि, माप पुस्तिका, कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र और किए गए भुगतानों की जांच जरूरी है। साथ ही उन वार्डों का भौतिक सत्यापन कराया जाना चाहिए, जहां बिना पर्याप्त कार्य के भुगतान होने की शिकायतें हैं।



