भरत पुर
महाभारत काल से जुड़ी परम्परा का किया निर्वाहन
भुसावर में आज भी कायम है,,मिट्टी से बने टेसूला और झांझी सजाने एवं खेलने का प्रचलन

लोकगीत गाकर मांगे उपहार
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
भुसावर : आज के बदलते परिवेश और डिजीटल युग में टेसूला खेलने एवं झांझी सजाने एवं खेलने की परम्परा का इतिहास एक धुंधली सी कहानी बन कर रह गया है। वहीं टेसूला और झांझी खेलने एवं सजाने की परम्परा राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार एवं हरियाणा में समय-समय पर विभिन्न रीति-रिवाजो के साथ खेला एवं मनाया जाता है। हालांकि विलुप्त हो रही इस टेसूला और झांझी सजाने एवं खेलने की परम्परा को ब्रज क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले भरतपुर जिले के ऐतिहासिक भुसावर शहर के बच्चे, युवक और युवतियां प्रच्लित प्रथा को जीवित बनाए हुए हैं। जहां शारदीय नवरात्रि घट स्थापना के प्रथम दिवस से लेकर प्रतिदिन विजयादशमी दशहरा तक शाम ढलने के साथ ही हाथों में टेसूला और सिर पर मटकी झांझी धारण करते हुए सामुहिक टोली बनाकर बच्चे, युवक और युवतियां गली, मौहल्ला के घरों और बजारों में दुकानों पर दस्तक देते हैं। जहां उनके द्वारा परम्परागत मंगलमय लोकगीत टेसूला- टेसूला घन्टार बजाइयों, दस नगरी दस गांव वसियों,,,,झांझी के रे झांझी के सीर सपुती के,,,,चली है प्यारी झांझी हम सब से मुखड़ा मोड़ के,,,दही बड़े में बन्नी लाओ सेठ अठन्नी जैसे तुकबन्दी गीतों के साथ बाल विवाह रोकथाम के साथ समाज में फैली कुरुतियों को दूर करने का आह्वान करते हुए समाज सुधार के विभिन्न संदेश देते हुए नजर आते है। जिन्हें देख कर दुकानदार, राहगीर इन्हें उपहार स्वरूप रुपया, पैसा और अन्नदान देकर इनका मनोबल बढ़ाते हुए हौसला अफजाई करते है।
यह है प्रचीन परम्परा
भुसावर बुजुर्ग कुन्जीलाल शर्मा, टिल्लाराम भगत और चेतराम ने जानकारी देते हुए बताया कि मान्यता के अनुसार टेसूला और झांझी सजाने एवं खेलने की परम्परा महाभारत काल से जुड़ी हुई है। जहां भीम के बेटे घटोत्वकच के पुत्र बर्बरीक को महाभारत की सेना में हारने वाले का साथ देते हुए भगवान श्री कृष्णा ने सुदर्शन चक्र से उनका सिर काट कर पहाड़ी पर एक पेड़ पर रख दिया। महाभारत के बाद बर्बरीक की इच्छा पूरी करने के लिए शरद पूर्णिमा के दिन टेसू और झांझी के विवाह निश्चय किया। तभी से यह टेसू और झांझी खेलने एवं सजाने की परम्परा चली आ रही है। वहीं भुसावर में टेसूला लेकर आए युवक एवं बच्चो विष्णु कुमार, द्रोण, जीतेश और ध्रुव एवं वैभव ने जानकारी देते हुए बताया कि टेसूला की आकृति तीन लकड़ी से बनी होती है, जिसमें एक और टेसू राजा दूसरी ओर मंत्री एवं और तीसरी और चौकीदार होता है और बीच में दीपक रखकर जलाते हैं। वही झांझी लेकर आई पुष्पा, रैनू, अन्नू, एवं कल्पना बच्चियों और युवतियों ने बताया कि झांझी की आकृति एक छोटी सी मटकी होती है, जिसमें कील से छिद्र कर विभिन्न प्रकार के डिजाइन बनाए जाते हैं। और मटकी में थोड़ी सी मिट्टी भरकर दीपक रखकर जलाते है। जिसका प्रकाश सांय के समय चहुंओर फैलता है। वहीं विजयादशमी, दशहरा के दिन टेसूला और झांझी की आकृति को नदी, तालाब, सरोवर विसर्जन करते हुए भगवान से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि के साथ विश्व कल्याण की मनोकामनाएं मांगी जाती है।



