नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : प्रेम, भाईचारे और सामाजिक एकता का संदेश देने वाला रंगों का त्योहार होली आज बदलते दौर की नई प्रवृत्तियों से प्रभावित नजर आ रहा है। जिस होली को कभी अपनापन, हंसी-मजाक और लोकगीतों की मधुरता के लिए जाना जाता था, वहां अब कई स्थानों पर शराब पीने-पिलाने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है। सामाजिक चिंतकों का मानना है कि इस बदलते चलन ने त्योहार की मूल भावना को पूरी तरह से प्रभावित किया है।
पहले गांव, शहर और कस्बों में बसंत पंचमी से ही ढोल, नगाड़े और झाल की थाप पर फाल्गुनी गीतों की गूंज सुनाई देने लगती थी। बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक सभी पारंपरिक फाग और होली गीतों में भागीदारी करते थे। लेकिन समय के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ती जा रही है। आधुनिकता के प्रभाव और बदलती जीवनशैली के बीच लोकगीतों की जगह तेज धुनों और फिल्मी गीतों ने ले ली है।
स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि तीन-चार दशक पहले तक होली का उत्सव सामूहिक उल्लास और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का प्रतीक हुआ करता था। राग और फाग की महफिलें सजती थीं, बच्चे उत्साह से रंग खेलते थे और आपसी गिले-शिकवे भुलाकर लोग गले मिलते थे। अब कई जगहों पर नशे की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण त्योहार का स्वरूप बदलता दिखाई देता है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों का मत है कि त्योहारों में बढ़ती असावधानी और अनुशासनहीनता के चलते जिला प्रशासन को भी अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ती है। शांति समिति की बैठकों से लेकर सुरक्षा व्यवस्था और अस्पतालों को अलर्ट मोड पर रखने तक की तैयारियां की जाती हैं, ताकि पर्व शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके। यह स्थिति इस ओर संकेत करती है कि सामुदायिक जिम्मेदारी को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि त्योहारों की आत्मा लोक संस्कृति, सामूहिक सहभागिता और पारिवारिक वातावरण में निहित होती है। यदि होली के पारंपरिक गीत, फाग, सामूहिक मिलन और बच्चों की खिलखिलाहट फिर से केंद्र में लाई जाए, तो त्योहार की मूल मिठास स्वतः लौट सकती है।
आज जरूरत है कि समाज मिलकर इस रंगोत्सव को उसके वास्तविक स्वरूप में मनाने का संकल्प ले—जहां प्रेम, समरसता और उल्लास की भावना सर्वोपरि हो, और आने वाली पीढ़ियां भी उस होली को देख सकें, जिसकी पहचान हंसी, अपनत्व और सांस्कृतिक विरासत से होती थी।


