ललितपुर
विश्व वन एवं जल दिवस पर विशेष
सादा जीवन ही पर्यावरण संरक्षण का असली समाधान : सिद्धार्थ शर्मा

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
ललितपुर। विश्व वन एवं जल दिवस के अवसर पर स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार सिद्धार्थ शर्मा ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर समाज को आत्ममंथन करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यह दिवस केवल औपचारिकता निभाने का नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने का अवसर है। उन्होंने कहा कि आज मानव अंधाधुंध उपभोग और विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति से दूर होता जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप जल संकट, वायु प्रदूषण और पर्यावरण असंतुलन जैसी गंभीर समस्याएं सामने आ रही हैं। ऐसे में सादा जीवन, उच्च विचार की जीवनशैली ही मानव अस्तित्व को बचाने का एकमात्र रास्ता है। सिद्धार्थ शर्मा ने भारतीय परंपरा का उल्लेख करते हुए बताया कि यहां वृक्षों को गुरु का स्थान दिया गया है। आदि शंकराचार्य के श्लोक चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धा: शिष्या गुरुर्युवाज् का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वृक्ष हमें स्थिरता, त्याग और उदारता का संदेश देते हैं। प्राचीन आरण्यक संस्कृति और गुरुकुल परंपरा भी प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक रही है। उन्होंने गौतम बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे प्राप्त ज्ञान का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रकृति और ज्ञान का संबंध अत्यंत गहरा है। इसके विपरीत वर्तमान समय में सुजलाम, सुफलाम भारत की कल्पना प्रदूषण और जल संकट से जूझती नजर आ रही है। नदियों का प्रदूषण, विषैली होती हवा और घटते जल स्रोत चिंता का विषय हैं। उन्होंने कहा कि पेड़ हमें निस्वार्थ सेवा, सहनशीलता और परोपकार का संदेश देते हैं, जबकि मनुष्य अपने स्वार्थ में प्रकृति का दोहन कर रहा है। न्यायालयों द्वारा भी समय-समय पर पर्यावरण को लेकर दी गई चेतावनियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो धरती मानव के लिए गैस चेंबर बन सकती है। अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में युद्धों के पर्यावरण पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे संघर्षों से प्रकृति को अपूरणीय क्षति होती है, जिसकी भरपाई में वर्षों लग जाते हैं। अंत में उन्होंने सभी नागरिकों से अपील की कि वे अपनी जीवनशैली में बदलाव लाते हुए जल संरक्षण, वृक्षारोपण और संतुलित उपभोग को अपनाएं। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण कोई अभियान नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार होना चाहिए, तभी आने वाली पीढय़िों को सुरक्षित भविष्य दिया जा सकता है।



