ललितपुर

बैसाखी पर्व साहस, समर्पण और आध्यात्मिक जागरण का अद्वितीय प्रतीक भी है : सिद्धार्थ शर्मा

भारतीय संस्कृति में बैसाखी का पर्व केवल ऋतु परिवर्तन या फसल कटाई का उत्सव मात्र नहीं

नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
ललितपुर। बैशाखी पर्व पर स्तम्भकार सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि बैशाखी विशेष रूप से सिख इतिहास में यह दिन एक ऐसी ऐतिहासिक घटना का साक्षी है, जिसने मानवता के पथ को नई दिशा प्रदान की। वर्ष 1699 की बैसाखी के दिन गुरु गोविन्द सिंह ने शिवालिक पर्वतमाला की गोद में स्थित आनंदपुर साहिब के केसगढ़ साहिब की पावन भूमि पर खालसा पंथ की स्थापना कर एक नई क्रांति का सूत्रपात किया। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह मानव आत्मा के पुनर्जागरण का उद्घोष था। गुरुजी का व्यक्तित्व वज्र के समान कठोर और पुष्प-पराग से भी अधिक कोमल था, जहाँ अन्याय के विरुद्ध अडिगता थी, वहीं मानवता के प्रति अपार करुणा भी थी। उस दिन देश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि काबुल-कंधार जैसे दूरस्थ क्षेत्रों से भी हजारों नवयुवक वहाँ एकत्रित हुए थे। वे गुरुजी से अमृत की दीक्षा लेकर अमृतधारी बनने को उत्सुक थे। यह दृश्य केवल एक सभा का नहीं, बल्कि आत्मबल, त्याग और राष्ट्रचेतना के जागरण का विराट प्रतीक था। प्रकृति भी मानो इस ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनकर उल्लास मना रही थी। खेतों में लहलहाती सुनहरी गेहूँ की बालियाँ समृद्धि और आत्मनिर्भरता का संदेश दे रही थीं। ऐसा प्रतीत होता था मानो वे स्वयं कह रही हों मैं हूँ न, मैं किसी को भूखा नहीं रहने दूँगी, और अपनी पौष्टिकता से सबको स्वस्थ रखूँगी। यह दृश्य भारत की कृषि-समृद्धि और जीवनदायिनी शक्ति का जीवंत प्रतीक था। इस उत्सव के मध्य गुरु वाणी का अमृत प्रवाहित हो रहा था। जउ तउ प्रेम खेलण का चाव, सिर धरि तली गली मेरे आऊ। यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। सच्चे प्रेम का मार्ग त्याग, साहस और समर्पण की माँग करता है। जो इस अमृत को चख लेता है, वह दूसरों के सम्मान और रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने से भी पीछे नहीं हटता। बैसाखी का यह ऐतिहासिक क्षण संसार के लिए एक प्रेरणा बना। खालसा पंथ के उदय ने सामान्य जन को असाधारण बना दिया—रंक राजा बन गया, और भेड़ें शेरों में परिवर्तित हो गईं। यह आत्मविश्वास, साहस और धर्मनिष्ठा का ऐसा संगम था, जिसने इतिहास की धारा को मोड़ दिया। सवा लाख की सेना पर एक अमृतधारी का भारी पडऩा केवल कथन नहीं, बल्कि उस युग की जीवंत सच्चाई थी। वास्तव में बैसाखी हमें यह सिखाती है कि जब मनुष्य प्रेम, सत्य और साहस के मार्ग पर चलता है, तो वह न केवल स्वयं का उत्थान करता है, बल्कि समाज और राष्ट्र को भी नई दिशा देता है। यह पर्व हमें आत्मबल, समर्पण और मानवता के प्रति अटूट निष्ठा का संदेश देता है। आज आवश्यकता है कि हम इस पावन पर्व के मूल संदेश को आत्मसात करें अन्याय के विरुद्ध डटकर खड़े हों, प्रेम और करुणा को जीवन का आधार बनाएं, और समाज में समरसता एवं भाईचारे की भावना को सुदृढ़ करें। यही बैसाखी का वास्तविक उत्सव है।
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