बेतुल
बैतूल सूचना के अधिकार की जानकारी देने से क्यों बच रहे अधिकारी
और आखिर पटवारी को क्यों बचाया जा रहा है?

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बैतूल आरटीआई के जवाब में टालमटोल से उठे सवाल, प्रशासनिक पारदर्शिता पर लग रहे प्रश्नचिह्न
बैतूल। जिले में एक बार फिर राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। आरोप है कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं कराई जा रही, बल्कि आवेदक को लगातार इधर-उधर घुमाया जा रहा है। मामला उस पटवारी से जुड़ा बताया जा रहा है, जिस पर पहले से ही कई तरह के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद संबंधित अधिकारी न तो स्पष्ट जवाब दे रहे हैं और न ही रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में रुचि दिखा रहे हैं। इससे आम लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर अधिकारी सूचना देने से बच क्यों रहे हैं और संबंधित पटवारी को बचाने की कोशिश किसके दबाव में की जा रही है।
जानकारी के अनुसार, आवेदक द्वारा राजस्व रिकॉर्ड, भूमि संबंधी दस्तावेज, नामांतरण, सीमांकन और अन्य प्रशासनिक कार्यों से जुड़ी सूचनाएं सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई थीं। लेकिन निर्धारित समय-सीमा के भीतर जानकारी उपलब्ध कराने के बजाय विभागीय स्तर पर चुप्पी साध ली गई। आरोप है कि संबंधित शाखा और अधिकारियों ने या तो आवेदन को लंबित रखा, या फिर ऐसा जवाब देने की कोशिश की जिससे मूल जानकारी देने से बचा जा सके। यही वजह है कि अब पूरे मामले को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि रिकॉर्ड और कार्रवाई पूरी तरह नियमों के तहत हुई है, तो फिर सूचना देने में हिचकिचाहट क्यों है। सूचना के अधिकार कानून का उद्देश्य ही यही है कि सरकारी कामकाज पारदर्शी रहे और आम नागरिक प्रशासन से जवाब मांग सके। ऐसे में अगर विभाग खुद ही सूचना रोकने लगे, तो यह कानून की भावना के विपरीत माना जाएगा। लोगों का यह भी आरोप है कि संबंधित पटवारी के खिलाफ शिकायतों और विवादों के बावजूद उसे संरक्षण दिया जा रहा है, जिसके कारण जांच और सूचना दोनों प्रभावित हो रही हैं।
मामले को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या विभागीय अधिकारियों पर किसी प्रकार का दबाव है, या फिर वे जानबूझकर ऐसी जानकारी सार्वजनिक नहीं करना चाहते जिससे कई अनियमितताओं का खुलासा हो सकता है। यदि ऐसा है, तो यह केवल एक व्यक्ति को बचाने का मामला नहीं बल्कि पूरे राजस्व तंत्र की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है। पारदर्शिता से बचने की यह प्रवृत्ति आम नागरिकों के भरोसे को कमजोर करती है और भ्रष्टाचार की आशंकाओं को और मजबूत करती है।
अब जरूरत इस बात की है कि जिला प्रशासन इस पूरे प्रकरण का संज्ञान लेकर यह स्पष्ट करे कि आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी अब तक क्यों नहीं दी गई, किस स्तर पर देरी हुई, और यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी जानबूझकर सूचना रोक रहा है तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी। साथ ही संबंधित पटवारी के खिलाफ लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाई जाए, ताकि यह संदेश जाए कि प्रशासन में जवाबदेही और पारदर्शिता केवल कागजों तक सीमित नहीं है।



