मेरठ

दस वर्ष का डाक्टरी का अनुभव प्रोफेसर के प्रयाप्त, निर्णय का जताया विरोध

- नेशनल यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स के संस्थापक ने नेशनल मेडिकल कमीशन के सचिव को लिखा पत्र

नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।

मेरठ। नेशनल यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स के संस्थापक डा. अनिल नौसरान ने नेशनल मेडिकल कमीशन के सचिव को पत्र लिखा है। 10 वर्षों के सरकारी चिकित्सीय अनुभव वाले डॉक्टरों को एसोसिएट प्रोफेसर के पद के लिए पात्र ठहराने पर आपत्ति वाले बयान पर विरोध प्रकट किया है। यह निर्णय अत्यंत आपत्तिजनक है और भारत की चिकित्सा शिक्षा प्रणाली की नींव को हिला देने वाला है।

डा. अनिल नौसरान सोमवार को इस संबंध में एक बयान जारी किया, कहा कि एक ऐसा चिकित्सक, जिसने केवल क्लिनिकल सेवा दी हो, कोई औपचारिक शिक्षण अनुभव या अकादमिक प्रशिक्षण न प्राप्त किया हो, वह मेडिकल छात्रों को पढ़ाने के लिए कैसे उपयुक्त माना जा सकता है? मात्र क्लिनिकल सेवा देना, शिक्षण क्षमता या अकादमिक दक्षता नहीं मानी जा सकती। अधिकांश मामलों में देखा गया है कि सरकारी डॉक्टरों को सेवा के 7–8 वर्षों बाद राज्य सरकार द्वारा डिप्लोमा कोर्स के लिए भेजा जाता है, जिसका उद्देश्य उनकी चिकित्सीय सेवाओं को बेहतर बनाना होता है, न कि उन्हें शिक्षक के रूप में तैयार करना। ऐसे डिप्लोमाधारी चिकित्सक स्वास्थ्य सेवाओं में तो कारगर हो सकते हैं, किंतु शिक्षण के क्षेत्र में वह पूरी तरह से अयोग्य हैं। ऐसे डॉक्टरों को एसोसिएट प्रोफेसर जैसे वरिष्ठ शैक्षणिक पदों पर नियुक्त करना, चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर गहरा आघात करेगा। इससे सिर्फ आंकड़ों में फैकल्टी की कमी पूरी होगी, लेकिन शिक्षा का स्तर बुरी तरह गिर जाएगा। इस निर्णय से एक खतरनाक संदेश जाएगा कि अब अकादमिक योग्यता, शोध कार्य और शिक्षण कौशल का कोई महत्व नहीं है, और केवल सेवा वर्ष ही पर्याप्त हैं।

  1. इस मनमाने और प्रतिगामी निर्णय को तुरंत वापस लिया जाए।
  2. गुणवत्ता पर ज़ोर दिया जाए, न कि संख्या बढ़ाने पर, यदि योग्य शिक्षक नहीं हैं, तो नए मेडिकल कॉलेज न खोले जाएं।
  3. फैकल्टी ट्रेनिंग, भर्ती मानकों और प्रोत्साहनों को मज़बूत किया जाए, ताकि योग्य और अकादमिक रूप से समर्पित लोग मेडिकल शिक्षा से जुड़ें।
  4. वर्तमान में योग्य शिक्षकों की कमी को स्वीकारें और उसका समाधान करें, लेकिन मापदंडों से समझौता करके नहीं।
  5. देश के भविष्य के डॉक्टरों को मज़बूत अकादमिक आधार मिलना चाहिए, ना कि शॉर्टकट और समझौते। यह निर्णय एक प्रकार का तुग़लकी फरमान प्रतीत होता है, जिसे तुरंत रद्द किया जाना चाहिए।
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