सिंगरौली
बंधा में जमीन कब्जे को लेकर आदिवासियों और पुलिस टीम में झड़प
कोल ब्लॉक के लिए जमीन पर कब्जे लेने पहुंची थी टीम

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
सिंगरौली । सिंगरौली भले ही ऊर्जाधानी के नाम से जाना जाता है लेकिन जिले में जिस तरह से कंपनियों का पदार्पण हुआ है उसी तरह क्षेत्र में जमीनों को लेने वाली कंपनियां और उस पर मुआवजा देने का खेल यहां वर्षों से चला आ रहा है। जिस तरह से यहां जमीन की खरीद फरोख्त की जाती है ठीक उसी तरह से यहां आये दिन जमीन को लेकर मारपीट और जान जाने की घटनाएं भी लगातार बढ़ती जाता है। यहां एक इंच जमीन भी अगर कोई अनायाश ले ले उसे लेकर लाठी, डंडे और बंदूके निकल जाती है। ऐसी स्थिति में कोई न कोई जमीन को लेकर या गंभीर रूप से घायल हो जाता है या फिर जान से चला जाता है। ऐसा ही एक मामला सिंगरौली जिले के तेंदुहा गांव में मंगलवार को प्रशासन और स्थानीय निवासियों के बीच तनावपूर्ण स्थिति बन गई। प्रशासनिक अमला भारी पुलिस बल के साथ दो हेक्टेयर सरकारी जमीन पर कब्जा लेने पहुंचा था। इसके बाद इस सरकारी जमीन पर रह रहे लोग और प्रभावित ग्रामीण वहां जमा हो गए। इस दौरान प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच तीखी बहस और झड़प भी हुई। इस बीच इलाके में तनाव की स्थिति बनी रही।
मामला बंधा कोल ब्लॉक से जुड़ा
यह मामला बंधा कोल ब्लॉक से जुड़ा है, जहां तेंदुहा गांव में दो हेक्टेयर सरकारी जमीन है। यह कोल ब्लॉक बिरला ग्रुप की कंपनी ईएमआईएल को आवंटित किया गया है। इस कोल ब्लॉक में पांच गांव – बांधा, तेंदुहा, देवरी, पाठ और जिगनहवा की कुल 776 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण होना है। दरअसल, यह वही कोल ब्लॉक है जो पिछले दिनों सुर्खियों में रहा था। यहां भू-अर्जन अधिकारी ने 3362 घरों को अवैध घोषित कर दिया गया था, जिन्हें मुआवजा पाने के लिए बनाया गया था।
ग्रामीण बोले- हमें जबरन यहां से भगाया जा रहा
गांव के निवासी दशाराम वैश्य ने कहा, “हमारा सब कुछ जंगल ही है। जंगल में ही जीना है, जंगल में ही मर जाना है। हमें जबरन यहां से भगाया जा रहा है।” एक अन्य विस्थापित कौशल सिंह तेंकाम ने बताया, “हमारी कहीं सुनवाई नहीं हो रही है। हम लोग लगातार जिला प्रशासन को आवेदन दे रहे हैं, फिर भी हमारी कोई सुनवाई नहीं हो रही। आज जबरदस्ती पुलिस बल के दम पर हमें यहां से हटाया जा रहा है।”
एसडीएम बोले-जमीन सरकारी है।
मौके पर पहुंचे देवसर एसडीएम अखिलेश सिंह ने कहा कि जमीन सरकारी है और उन्हें सरकारी जमीन कंपनी को देनी है। हालांकि, वे इससे अधिक कुछ बोलने को तैयार नहीं थे।




