ललितपुर

जगमग होने को तैयार हुये “दीपक”

कड़ी मेहनत के बाद सांचे में ढाली जाती है मिटटी

चीनी दियों का नहीं दिखेगा असर, देशी दियों की रहेगी भरमार

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो

ललितपुर। जीवन में नई उमंग, तरंग, रौशनी और उम्मीदों का त्यौहारों दीपावली आने में कुछ दिन ही शेष बचे हैं। दीपावली भले ही अक्टूबर माह में है, लेकिन इसकी तैयारियां कई महीनों पहले से शुरू हो जाती है। विदेशी सामान के प्रति बदले लोगों के नजरिए के चलते इस वर्ष विदेशी सामान के साथ ही चाइनीज दियों को लोग अभी से नजर अंदाज करते देखे जा सकते हैं। इससे यही लग रहा है कि इस वर्ष दीपावली पर देशी मिटटी से बने दीपक घर-घर पहुंच कर अंधेरा दूर करने के लिए जगमग होंगे। गौरतलब है कि धन, यश, वैभव की देवी मां लक्ष्मी व भगवान विष्णु की आराधना का प्रतीक दीपावली वर्ष का सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है। दीपावली को दीप का त्यौहार भी कहा जाता है। दीवाली इसलिए मनायी जाती है क्योंकि इस दिन भगवान श्री राम 14 साल का वनवास काटकर अयोध्या लौटे थे। दीवाली की शाम भगवान लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। इन दिन सभी लोग अपने घरों, दुकानों, दफ्तरों आदि में दीप जलाते हैं।
कुम्हार (प्रजापति) समाज का दीपक बनाने में बड़ा योगदान
दीपावली त्यौहार को लेकर महीनों पहले शुरू होने वाली तैयारियों को लेकर बुन्देलखण्ड में कुम्हार (प्रजापति) समाज के लोग खेत से मिटटी लाते हैं। मिटटी का शोधन कर उसमें मिटटी के दिये व अन्य वर्तन बनाने के लिए तैयार करते हैं। पूरी तरह से तैयार होने के बाद मिटटी का चाक पर रखकर उसे विभिन्न आकारों में ढाल कर दिये, तवा, मटका, मटकी, गुल्लक इत्यादि के अलावा अनेकों प्रकार के वर्तन बनाये जाते हैं। मिटटी से बने इन वर्तनों को शुद्धता का प्रतीक भी कहा जाता है।
मिटटी के लिए पट्टों की दरकार
कुम्हार जाति के लोगों को शासन द्वारा आजीविका संचालन के लिए इलैक्ट्रिक चाक तो प्रदान किये गये थे, लेकिन उसमें कोई भी सामग्री बनाने के लिए उपयोग होने वाली मिटटी के लिए जमीनों के पट्टों का आवंटन नहीं किया गया है, जिससे चाक पाने के बाद भी कई लाभार्थियों के पास मिटटी न होने के कारण चाक बंद पड़े हैं और योजना भी अपना सार्थक रूप नहीं ले पा रही है। ऐसे में सजातीय बंधुओं ने शासन-प्रशासन से मिटटी के लिए जमीन के पट्टे किये जाने की मांग उठायी है। दिये बनाने वाले लोग बताते हैं कि उन्हें शासन से चाक देकर लाभान्वित तो किया गया था, लेकिन जमीन के लिए पट्टे नहीं दिये गये, जिससे उन्हें मिटटी के लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
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