असम के कमलपुर BJP टिकट बंचित अंकुर दास का आगाजी निर्वाचन प्रचार।
भाजपा उम्मीदवार दिगंत कलिता की उड़ा रही है नींद ।

नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
असम के कमलपुर सीट पर चुनावी माहौल रोज तीखा होता जा रहा है। यहाँ भाजपा की ओर से नामांकन के लिए चुने गए उम्मीदवार दिगंत कलिता के साथ-साथ राज्य की भाजपा शीर्षक नेता भी एक निर्दलीय प्रत्याशी की दौड़ से काफी तनाव महसूस कर रहा है। कमलपुर निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के टिकट बंचित प्रमुख नेता अंकुर दास ने पार्टी से नाराज होकर निर्दलीय रूप से चुनावी मैदान में उतरा है। उनका दावा है कि उनके जनसंपर्क और स्थानीय जनता के समर्थन को भाजपा पार्टी प्रबंधन ने नजरअंदाज किया, इसलिए वे “जनता के लिए और नेतृत्व के लिए” निर्दलीय रूप से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। अंकुर दास का निर्वाचनी प्रचार अत्यंत आगाजी और ग्राम–ग्राम तक फैला हुआ है। गांव की पंचायतों से लेकर मुख्य बाजारों में उनकी रोडशो, जनसभाएं और माइक निकासी अभियान ने भाजपा उम्मीदवार दिगंत कलिता के लिए राजनीतिक टेंशन को और बढ़ा दिया है। भाजपा के स्थानीय नेतृत्व का दावा है कि दिगंत कलिता को भी जनसमर्थन मिल रहा है, लेकिन अंकुर दास का निर्दलीय उदय इस गणित को बिखेर सकता है। कमलपुर के कई पंचायतों में जनता अब सीधे तौर पर कमलपुर के विकास और ग्रामीण समस्याओं को लेकर दोनों नेताओं से सवाल कर रही है। दलित, युवा और खेती व छोटे व्यवसाय से जुड़े वर्ग अंकुर दास के “निर्दलीय रूप से जनता के लिए” वाले नारे पर विशेष ध्यान दे रहे हैं, जिससे भाजपा के भीतर यह चिंता बढ़ रही है कि अपने ही आधारभूत मतदाताओं के बीच टिकट बंचित नेता सामने आकर वोट बैंक खंडित कर सकता है ओर कमलपुर से कांग्रेस की और से चुनाव लड़ रहे सत्यव्रत कलिता को जित दिलाने में मदद कर सकता है । कमलपुर के चुनावी माहौल को देखते हुए असम भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने भी इस सीट पर विशेष नजर रखी हुई है। आंतरिक बैठकों में अंकुर दास के निर्दलीय अभियान को “अंदरूनी खतरा” बताते हुए दिगंत कलिता के लिए मजबूत जनसंपर्क अभियान और दलीय अनुशासन पर जोर दिया गया है। राज्य भाजपा नेतृत्व का मानना है कि अगर कमलपुर जैसी की-सीट पर भाजपा उम्मीदवार को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, तो इसका असर पूरे राज्य स्तर के चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है। कमलपुर की तस्वीर अब यह उभर रही है कि भाजपा के टिकट बंचित नेता अंकुर दास का निर्दलीय अभियान सिर्फ एक व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं, बल्कि राज्य की शक्ति संरचना पर एक गंभीर सवाल बनकर उभर रहा है।


