गाजियाबाद

चौथे स्तंभ को कमजोर करने की कोशिश में कथित पत्रकार

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी : हर जागरूक नागरिक यह भली-भांति जानता है कि पत्रकारिता जनता और शासन-प्रशासन के बीच एक सशक्त सेतु का कार्य करती है। इसी माध्यम से समाज तक सच्ची, सही और तथ्यपरक जानकारी पहुंचती है, जिससे अच्छे और बुरे कार्यों में अंतर स्पष्ट हो पाता है। लेकिन वर्तमान समय में कुछ कथित पत्रकारों की गतिविधियां ऐसी देखने-सुनने को मिल रही हैं, जो न केवल पत्रकारिता की मर्यादा के बिल्कुल विपरीत हैं, बल्कि देश के चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं।
यदि पत्रकारिता निष्पक्षता, ईमानदारी और सकारात्मक सोच के साथ की जाए, तो यह इतनी प्रभावशाली शक्ति बन सकती है कि किसी भी सत्ता को उसकी जिम्मेदारियों का अहसास करा सके। इसके विपरीत, जब यही माध्यम निजी स्वार्थ, लाभ या चापलूसी का जरिया बन जाए  तो वह समाज और सरकार—दोनों के लिए घातक सिद्ध होती है। ऐसी पत्रकारिता न केवल अपने उद्देश्य से भटक जाती है, बल्कि पूरे पेशे के लिए कलंक बन जाती है।
कुछ कथित पत्रकार पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों की चापलूसी कर स्वयं को बड़ा और प्रभावशाली पत्रकार साबित करने का प्रयास लगातार करते हैं। यह उनकी सबसे बड़ी भूल होती है, क्योंकि वे यह नहीं समझ पाते कि कई बार अधिकारियों को भी ऐसे ही संकीर्ण सोच वाले पत्रकारों की आवश्यकता होती है, जो सच दिखाने के बजाय उनकी सुविधानुसार खबरें परोसें।
वास्तव में, चौथे स्तंभ से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि पत्रकारिता का उद्देश्य वाहवाही बटोरना, लोकप्रियता हासिल करना या निजी हित साधना नहीं है। यह समाज के प्रति एक जिम्मेदारी और कर्तव्य है। पत्रकार का धर्म है कि वह सामाजिक, प्रशासनिक या राजनीतिक किसी भी विषय में सच्चाई की तह तक जाए और अपने कार्यक्षेत्र के माध्यम से तब तक प्रयासरत रहे, जब तक सच सामने न आ जाए।
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनहित से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों को तथ्यात्मक और मर्यादित शब्दों में जनता तक पहुंचाना है, ताकि उनका उपयोग समाज और देश के हित में हो सके। बिना किसी भेदभाव के सेवा भाव से किया गया यह कार्य ही पत्रकारिता की असली पहचान है। इस मार्ग पर चलने वाला पत्रकार निडर होता है—भय उसे नहीं, बल्कि गलत कार्य करने वालों को होता है।
लेकिन यदि कोई पत्रकार इस सच्चे मार्ग से भटककर चापलूसी और स्वार्थपरक पत्रकारिता करता है, तो उसे आज नहीं तो कल अपमान का सामना अवश्य करना पड़ता है। ऐसे उदाहरण समय-समय पर देखने और सुनने को मिलते रहते हैं, जो पत्रकारिता के नाम पर एक बदनुमा दाग हैं।
अंत में, हर देशवासी को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि—
> “बिकाऊ पत्रकार और सोई हुई जनता—ये दोनों ही किसी भी देश को बर्बादी की ओर ले जाने के लिए पर्याप्त हैं।”
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