गोड्डा

पहाड़पुर का एक परिवार वर्षों से बांस और लकड़ी के पारंपरिक सामान बनाकर अपनी संस्कृति को संजोए

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो 
सुंदरपहाड़ी। प्रखंड के पहाड़पुर गांव में आज भी एक परिवार पुरानी संस्कृति और पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए है। आधुनिकता के इस दौर में जहां मशीनों ने हाथों के हुनर को पीछे छोड़ दिया है। वहीं, पहाड़पुर का एक परिवार वर्षों से बांस और लकड़ी के पारंपरिक सामान बनाकर अपनी संस्कृति को संजोए हुए है। यह हैं पहाड़पुर गांव के रहने वाले बिसनाथ मोहली। इनके परिवार की कई पीढ़ियां बांस से टोकरी, सूप, डलिया और अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाती आ रही हैं।
क्या कहते हैं मोहली :
बिसनाथ मोहली बताते हैं कि यह कला उन्हें विरासत में मिली है। ये काम मेरे पिताजी पहले से करते आ रहे थे। बचपन से ही मैं उन्हें देखता था और उन्हीं से मैंने ये काम सीखा है। आज भी हम इसी काम से अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। ”सिर्फ बिसनाथ ही नहीं, उनके परिवार की महिलाएं भी इस कार्य में बराबर की भागीदारी निभा रही हैं। पूरा परिवार मिलकर बांस को काटने, छीलने और उससे खूबसूरत टोकरी बनाने का काम करता है।
बदलते समय में पारंपरिक कला को मिल रही चुनौतियां :
मोहली ने कहा : लेकिन बदलते समय के साथ इस पारंपरिक कला को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बाजार में प्लास्टिक के सस्ते सामान आने से इनकी मांग पहले जैसी नहीं रही।
“पहले हमारे सामान की बहुत मांग रहती थी, लेकिन अब प्लास्टिक के सामान के कारण काम कम हो गया है। फिर भी हम अपनी परंपरा को छोड़ना नहीं चाहते।” यह परिवार आज भी दिनभर मेहनत कर हाथों से एक-एक टोकरी तैयार करता है। मेहनताना भले ही कम हो, लेकिन अपनी संस्कृति और परंपरा को बचाए रखने का जुनून इन्हें आगे बढ़ाता है।
ऐसे हुनरमंद को सरकार की सहायता की आस :
जरूरत है ऐसे कारीगरों को सरकारी सहयोग, बाजार और पहचान दिलाने की, ताकि यह कला आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रह सके। सुन्दरपहाड़ी के पहाड़पुर गांव का यह परिवार हमें यह संदेश देता है कि आधुनिकता के बीच भी अपनी जड़ों और परंपराओं को संभालकर रखना कितना जरूरी है।
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