राष्ट्रीय राजमार्ग पर सुरक्षित यातायात अब ‘जीवन के अधिकार’ का हिस्सा
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय।

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
असम : सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन के अधिकार’ की व्याख्या को और व्यापक बनाते हुए राष्ट्रीय राजमार्गों पर सुरक्षित यातायात को नागरिकों का मौलिक अधिकार माना है। अदालत ने कहा कि नागरिकों को सुरक्षित, वाहन-योग्य और उचित ढंग से रखरखाव वाली सड़कों पर यातायात करने का अधिकार ‘गरिमा के साथ जीने के अधिकार’ का एक अनिवार्य अंग है, जिसका उल्लंघन पथरीली या खराब अवस्था वाली सड़कों से होने वाली दुर्घटनाओं में भी माना जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 में छुपा ‘जीवन का अधिकार’ केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने तक विस्तृत है। इसी भावना के आधार पर अदालत ने माना कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर सुरक्षित, सुव्यवस्थित और वाहन‑योग्य सड़कों तक पहुँचना भी इसी अधिकार का अभिन्न अंग है। इस तरह पथरीली गाड़ियों, गड्ढों और खराब डिजाइन वाली सड़कों से होने वाले दुर्घटनाग्रस्त घटनाक्रम को केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि नागरिक के मौलिक अधिकार का उल्लंघन माना गया है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सड़क‑निर्माण और रखरखाव संबंधी अधिकारियों को याद दिलाया कि राज्य की जिम्मेदारी केवल पटरिया या ओवरपास बनाना नहीं, बल्कि इन सड़कों की नियमित मरम्मत, तकनीकी मानकों का पालन और दुर्घटना के संभावित ‘ब्लैक‑स्पॉट’ दूर करना भी है। अदालत ने कहा कि सरकार किसी भी निजी संस्था या ठेकेदार को काम देकर अपनी मूल जिम्मेदारी से नहीं बच सकती और यदि गाफिलती से नागरिकों की जान चली जाती है, तो भाग्यवाद या ‘दुर्घटना’ के नाम पर नहीं, बल्कि राज्य की विफलता के रूप में देखा जाएगा। इस ऐतिहासिक निर्णय ने देशभर में पथ‑सुरक्षा नीतियों पर पुनर्विचार की राह साफ कर दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, आगे जब भी कोई राष्ट्रीय राजमार्ग पर दुर्घटना होगी और जांच से साबित हो कि सड़क की खराब स्थिति, अनुपयुक्त लेआउट या सुरक्षा उपकरणों की कमी उसमें भूमिका निभाई, तो संबंधित केंद्रीय और राज्य सरकारों के विभाग कानूनी तौर पर अधिक जवाबदेह होंगे। इसके चलते नवीन पथ‑निर्माण एवं निविदा प्रक्रियाओं में गुणवत्ता, पारदर्शिता और दीर्घकालिक रखरखाव के मानकों पर अधिक जोर पड़ने की अपेक्षा की जा रही है। अदालत के इस रुख से यह संकेत मिलता है कि आगे‑आगे राष्ट्रीय राजमार्गों पर यात्रा करना केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि एक मजबूत आईनी अधिकार के रूप में माना जाएगा। जनता उम्मीद कर रही है कि इस फैसले के बाद सड़कों की अवस्था, दुर्घटना रोकथाम कार्यक्रम और आपातकालीन इंतजामों में सुधार होगा, जिससे हर साल हजारों प्राणों की रक्षा की संभावना बढ़ेगी।



