बागपत

बकरा ईद: त्याग, समर्पण और इंसानियत का उत्सव सुरेंद्र मलानिया

नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।

बागपत : हर साल की तरह इस बार भी जब बकरा ईद (ईद-उल-अजहा) का पावन पर्व दस्तक देता है, तो न केवल मुसलमानों के लिए बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए यह त्याग और समर्पण का संदेश लेकर आता है। यह पर्व हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की उस बेमिसाल कुर्बानी की याद दिलाता है, जहाँ उन्होंने अल्लाह की रज़ा के लिए अपने सबसे प्यारे बेटे की कुर्बानी देने में भी संकोच नहीं किया।

 बकरा ईद का इतिहास और महत्व

हज़रत इब्राहीम को जब अल्लाह की तरफ से यह आदेश मिला कि वह अपनी सबसे प्यारी चीज़ कुर्बान करें, तो उन्होंने अपने बेटे इस्माईल को कुर्बानी के लिए प्रस्तुत किया। यह देखकर अल्लाह ने उनकी नीयत और भक्ति से प्रसन्न होकर, बेटे की जगह एक दुम्बा (भेड़) भेजा। तब से यह दिन “ईद-उल-अजहा” के रूप में मनाया जाता है, जिसका अर्थ है त्याग का त्योहार

यह त्योहार इस्लामिक कैलेंडर के 12वें महीने ज़िलहिज्जा की 10 तारीख को मनाया जाता है। हज यात्रा के पूर्ण होने के साथ ही यह पर्व आता है और मुसलमान न केवल जानवर की कुर्बानी देते हैं, बल्कि अपने अहंकार, लालच और द्वेष को भी काटने का संकल्प लेते हैं।


 त्योहार की रूह: कुर्बानी नहीं, भावना

बकरा ईद के मौके पर दी जाने वाली कुर्बानी का मकसद केवल मांस का बंटवारा नहीं है, बल्कि यह एक उच्चतम मानव मूल्य – त्याग – की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। कुरआन शरीफ में साफ लिखा है:

“न अल्लाह तक उनका गोश्त पहुंचता है और न खून, बल्कि उस तक तुम्हारी परहेज़गारी पहुँचती है।”

इसलिए, कुर्बानी का असल उद्देश्य अल्लाह की आज्ञा का पालन करते हुए अपने भीतर की बुराइयों को काटना है।


 बंटवारा नहीं, भाईचारा

बकरा ईद का सबसे सुंदर पहलू यह है कि कुर्बानी का मांस तीन हिस्सों में बांटा जाता है:

  1. एक हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों को,
  2. एक हिस्सा रिश्तेदारों व पड़ोसियों को,
  3. और एक हिस्सा अपने परिवार के लिए।

यह प्रणाली समाज में समानता, दया और भाईचारे की भावना को मजबूत करती है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि खुशियाँ तभी पूरी होती हैं जब वो बाँटी जाएँ।


 आधुनिक समाज के लिए संदेश

आज जब दुनिया स्वार्थ, असहिष्णुता और वैमनस्य की ओर बढ़ रही है, बकरा ईद हमें याद दिलाती है कि

  • त्याग बड़ा धर्म है,
  • दूसरों की भलाई में ही असली इबादत है,
  • और इंसानियत से बड़ा कोई मजहब नहीं

यह पर्व हमें उस दिशा में ले जाता है जहाँ हम दूसरों के दर्द को समझें, बाँटें और एक बेहतर समाज की नींव रखें।


 अंत में एक दुआ

इस बकरा ईद पर हम सब यह दुआ करें:

या अल्लाह! हमें वह दिल अता कर, जो दूसरों के लिए धड़क सके। वह हाथ दे, जो देने में यकीन रखे। और वह सोच दे, जो नफ़रत से ऊपर उठ सके।



			
		
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