असमानताओं पर ध्यान दिए बिना, कोई राष्ट्र सही में लोकतांत्रिक होने का दावा नहीं कर सकता: सीजेआई गवई।

नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
नई दिल्ली। भारत के प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई ने कहा है कि समाज के बड़े हिस्से को हाशिए पर रखने वाली संरचनात्मक असमानताओं पर ध्यान दिए बिना कोई भी राष्ट्र वास्तव में प्रगतिशील या लोकतांत्रिक होने का दावा नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि दीर्घकालिक स्थिरता, सामाजिक सामंजस्य और सतत विकास प्राप्त करने के लिए सामाजिक-आर्थिक न्याय एक व्यावहारिक आवश्यकता है। बुधवार को मिलान में ‘देश में सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करने में संविधान की भूमिका : भारतीय संविधान के 75 वर्षों के प्रतिबिंब विषय पर एक समारोह को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि न्याय एक अमूर्त आदर्श नहीं है और इसे सामाजिक संरचनाओं, अवसरों के वितरण और लोगों के रहने की स्थितियों में जड़ें जमानी चाहिए। उन्होंने कहा,समाज के बड़े हिस्से को हाशिए पर रखने वाली संरचनात्मक असमानताओं पर ध्यान दिए बिना कोई भी राष्ट्र वास्तव में प्रगतिशील या लोकतांत्रिक होने का दावा नहीं कर सकता। दूसरे शब्दों में, दीर्घकालिक स्थिरता, सामाजिक सामंजस्य और सतत विकास प्राप्त करने के लिए सामाजिक-आर्थिक न्याय एक व्यावहारिक आवश्यकता है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि यह केवल पुनर्वितरण या कल्याण का मामला नहीं है, बल्कि यह हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने, उसकी पूरी मानवीय क्षमता का एहसास कराने और देश के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन में समान रूप से भाग लेने में सक्षम बनाने के बारे में भी है। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने अक्सर कहा है, और मैं आज यहां फिर दोहराता हूं, कि समावेश और परिवर्तन के इस संवैधानिक दृष्टिकोण के कारण ही मैं भारत के प्रधान न्यायाधीश के रूप में आपके सामने खड़ा हूं।



