बेतुल

बैतूल जल, जंगल और जमीन बचाने बंजारीढाल पहुंची हरियाली यात्रा

शहीद गंजन सिंह, मोकम सिंह, विष्णु सिंह और रामको बाई को किया नमन, जल, जंगल, जमीन बचाने का लिया संकल्प

हरियाली अभियान का अगला पड़ाव आज शाहपुर में,रैली निकालकर प्रशासन को सौंपा जाएगा ज्ञापन
बैतूल, चिचोली और घोड़ाडोंगरी के बाद शाहपुर में हरियाली रैली निकालेंगे आदिवासी 
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो 
बैतूल। पर्यावरण संरक्षण, बेरोजगारी और कुपोषण जैसी चुनौतियों का स्थानीय समाधान प्रस्तुत करने निकला श्रमिक आदिवासी संगठन और समाजवादी जन परिषद का हरियाली जनजागरण अभियान आज शनिवार को शाहपुर पहुंचेगा।
श्रमिक आदिवासी संगठन और समाजवादी जन परिषद के बैनर तले एक माह से चल रही हरियाली जनजागरण यात्रा शुक्रवार, 7 अगस्त को घोड़ाडोंगरी विकासखंड के ग्राम बंजारीढाल पहुंची, जहां गांधी चौक पर ग्रामीणों ने यात्रा का तिलक लगाकर और पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। यात्रा के दौरान 1930 के जल, जंगल और जमीन आंदोलन के क्रांतिकारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों गंजन सिंह, मोकम सिंह, विष्णु सिंह और रामको बाई को श्रद्धांजलि देते हुए उनके छायाचित्र पर माल्यार्पण एवं तिलक कर पूजा-अर्चना की गई।
आदिवासी परंपरा के अनुसार आम के फलदार पौधे और पीपल के छायादार पौधे की पूजा कर उस पर लाल झंडा चढ़ाया गया तथा उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया गया। इस दौरान जल, जंगल और जमीन को कंपनियों के हाथों में नहीं जाने देने तथा सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध जारी रखने का ऐलान किया गया। कार्यक्रम में राजेंद्र गढ़वाल, कुअरलाल, जगदीश, किशोरी, राजू, सोहन, कविता, बलवंत, श्रीराम, सेदल सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।
बैतूल, खेड़ी, चिरापाटला, चिचोली और घोड़ाडोंगरी में लगातार रैलियां निकालने तथा प्रशासन को ज्ञापन सौंपने के बाद अब संगठन आज शाहपुर में जामुन, आंवला, सीताफल, मुनगा और आम सहित 5 हजार फलदार पौधे उपलब्ध कराने की मांग करेगा। संगठन का कहना है कि इस मॉडल को शासन का सहयोग मिला तो गांवों में बड़े पैमाने पर फलदार बाग विकसित होंगे, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय रोजगार, जल संरक्षण और पोषण सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी।
हरियाली जनजागरण अभियान की शुरुआत बैतूल से हुई थी, जहां आदिवासियों ने फलदार पौधों के साथ हरियाली रैली निकालकर अभियान का शुभारंभ किया था। इसके बाद खेड़ी, चिरापाटला, चिचोली और घोड़ाडोंगरी में रैलियां निकाली गईं तथा प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर क्षेत्र में फलदार पौधों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की गई। अब अभियान का अगला और महत्वपूर्ण चरण शाहपुर में आयोजित होगा, जहां संगठन शासन से 5 हजार फलदार पौधे उपलब्ध कराने की मांग करेगा।
– हर गांव में फलदार बगीचे विकसित करने का लक्ष्य
संगठन के राजेंद्र गढ़वाल का कहना है कि अभियान का उद्देश्य गांवों की अनुपयोगी सार्वजनिक भूमि और खेत-बाड़ियों में फलदार बगीचे विकसित करना है। इसके लिए जामुन, आंवला, सीताफल, मुनगा और आम जैसे पौधों को प्राथमिकता देने की योजना बनाई गई है। संगठन का मानना है कि इन पौधों के विकसित होने से ग्रामीणों को फल, छाया, भू-जल संरक्षण और अतिरिक्त आय का लाभ मिलेगा। भविष्य में फल प्रसंस्करण आधारित छोटे उद्योग भी स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकते हैं।
– बीज और खाली थैलियों से तैयार हो रहे पौधे
अभियान की सबसे अलग पहचान इसका कम लागत वाला मॉडल है। संगठन के कार्यकर्ता बाजारों और गांवों में लोगों से किराना, दूध तथा अन्य सामान की खाली प्लास्टिक थैलियां और पके फलों के बीज एकत्र करने की अपील कर रहे हैं। इन्हीं थैलियों में बीजों से पौधे तैयार किए जाएंगे और अगले वर्षा मौसम में गांवों में रोपे जाएंगे। संगठन का कहना है कि इस मॉडल में जनभागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है और इसी के जरिए बड़े पैमाने पर हरियाली अभियान को जनआंदोलन बनाया जा सकता है।
– वर्षों से जारी है पर्यावरण और रोजगार की मुहिम
श्रमिक आदिवासी संगठन और समाजवादी जन परिषद का दावा है कि वह पिछले दो दशकों से अधिक समय से बैतूल और हरदा क्षेत्र में हरियाली अभियान चला रहे हैं। संगठन के अनुसार अब तक लगभग 50 हजार फलदार पौधे लगाए जा चुके हैं। राजेंद्र गढ़वाल, अनुराग मोदी, संजय आर्य, रविशंकर सहित संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि पर्यावरण संकट, घटता जलस्तर, बढ़ती गर्मी, बेरोजगारी और कुपोषण जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान बड़े पैमाने पर फलदार पौधरोपण से संभव है।
– सरकार से सहयोग, समाज से सहभागिता की उम्मीद
संगठन ने शासन से निःशुल्क फलदार पौधे उपलब्ध कराने और लगाए गए पौधों के संरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है। साथ ही आम नागरिकों से अभियान में सक्रिय भागीदारी करते हुए बीज और खाली प्लास्टिक थैलियां उपलब्ध कराने की अपील की है। संगठन का कहना है कि यदि सरकार और समाज मिलकर इस मॉडल को अपनाते हैं तो आने वाले वर्षों में बैतूल जिले के गांव पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय रोजगार और पोषण सुरक्षा का सफल उदाहरण बन सकते हैं।
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