नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : जनपद गाजियाबाद का लोनी क्षेत्र इन दिनों विकास की चर्चाओं से अधिक सियासी बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप को लेकर सुर्खियों में बना हुआ है। राजनीतिक गतिविधियों का स्तर इस कदर बदलता दिखाई दे रहा है कि सड़क, नाली, रोजगार और बुनियादी सुविधाएं जैसे मुद्दे कहीं पीछे छूटते नजर आते हैं। सोशल मीडिया की रीलों से लेकर थाने और पुलिस अधिकारियों के कार्यालयों तक सियासत का नया रंग क्षेत्र में देखने को मिल रहा है।
बयानबाजी में मर्यादा की सीमा लांघने का आरोप
लोनी की राजनीति में नेताओं और उनके समर्थकों के बीच सोशल मीडिया पर एक दूसरे के खिलाफ तीखी टिप्पणियों और विवादित बयानों का दौर लगातार जारी है। नेता व उनके समर्थकों द्वारा वीडियो और रीलों के माध्यम से एक-दूसरे को चुनौती देने, कथित तौर पर अपशब्द कहने और देख लेने जैसी भाषा का इस्तेमाल राजनीतिक माहौल को और गरमाता नजर आ रहा है। हालात ऐसे हैं कि सोशल मीडिया पर चल रही यह जुबानी जंग अब राजनीतिक बहस से आगे निकलती दिखाई देती है।
रील बनी नेताओं और कार्यकर्ताओं का सियासी हथियार
सोशल मीडिया के दौर में रील और वीडियो राजनीतिक प्रचार का बड़ा माध्यम बन चुके हैं। लोनी में भी समर्थकों और नेताओं की ओर से लगातार एक दूसरे के खिलाफ तंज व व्यंग्य कसने के वीडियो लगातार सामने आ रहे हैं। इन वीडियो में राजनीतिक मुद्दों से ज्यादा एक-दूसरे पर निशाना साधने और आरोप लगाने की होड़ दिखाई देती है। नतीजा यह है कि सोशल मीडिया की एक छोटी-सी पोस्ट भी देखते ही देखते राजनीतिक विवाद का कारण बन जाती है।
थाने से लेकर अदालत तक पहुंच रही सियासत
सियासी विवादों का असर अब पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया तक भी दिखाई देने लगा है। किसी बयान या वीडियो को लेकर शिकायत, मुकदमा और कार्रवाई की मांग सामने आती है तो जवाब में दूसरे पक्ष की ओर से भी आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं। राजनीतिक विरोध की यह लड़ाई कब थाने और अदालत की चौखट तक पहुंच जाती है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
बुलडोजर, पंचायत और सियासी शक्ति प्रदर्शन
लोनी की सियासत में अवैध कब्जों और निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी कई बार राजनीतिक बहस का हिस्सा बनती दिखाई देती है। इसके साथ ही अलग-अलग सामाजिक और बिरादरी स्तर की पंचायतों के जरिए शक्ति प्रदर्शन का दौर भी जारी है। मंचों से समर्थन और विरोध के संदेश दिए जा रहे हैं, जबकि सोशल मीडिया पर इन आयोजनों की भीड़ को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में ऐसे स्थानीय राजनीतिक समर्थक भी सक्रिय हैं, जो अपने-अपने नेताओं के पक्ष में सोशल मीडिया पर मोर्चा संभाले हुए हैं। कई बार आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और सियासी समर्थकों की सक्रियता विवाद को और हवा देती नजर आती है।
जनता के हिस्से में आखिर क्या आया?
सियासी बयानबाजी, मुकदमों, पंचायतों और सोशल मीडिया की लड़ाई के बीच सबसे बड़ा सवाल आम जनता से जुड़ा है। जिस राजनीति में सड़क, जलभराव, बिजली, सफाई, रोजगार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर लगातार चर्चा होनी चाहिए, वहां यदि राजनीतिक ऊर्जा एक-दूसरे को घेरने में ही खर्च होती रहे तो जनता के सवाल स्वाभाविक रूप से पीछे छूटते हैं।
लोनी की जनता शायद अब यही उम्मीद कर रही है कि सियासत का यह तापमान कुछ कम हो और नेताओं की शब्दावली भी कुछ संयमित हो। आखिर लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता जरूरी हो सकती है, लेकिन जनता को गाली-गलौज, आरोपों और मुकदमों का तमाशा नहीं, बल्कि काम और जवाबदेही चाहिए।
व्यंग्य यही है कि लोनी की सियासत में अगर विकास की रफ्तार भी सोशल मीडिया की रीलों जितनी तेज हो जाए, तो शायद जनता को भी इस राजनीतिक मनोरंजन से कुछ राहत मिल सके।
