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उत्तर भारत की जेलों में तैयार हो रहे खालिस्तानी गुर्गे! 

गुप्तचर के बड़े खुलासे से मचा हमला, पन्नुन नेटवर्क पर प्रहार शुरू

नई दिल्ली :  जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपी प्रीतपाल सिंह ने खुलासा किया कि जेल में सजा काटने के दौरान ही उसे खालिस्तान समर्थक गतिविधियों से जुड़े लोगों ने अपने प्रभाव में लिया था। इसी दौरान उसे विदेश में बैठे खालिस्तानी अलगाववादी गुरपतवंत सिंह पन्नू से संपर्क करने के लिए फोन नंबर भी उपलब्ध कराया गया।
उत्तर भारत की जेलें अब केवल अपराधियों को बंद रखने की जगह नहीं रह गई हैं, बल्कि आतंकी नेटवर्क के लिए नए गुर्गे तैयार करने का माध्यम भी बनती जा रही हैं। हम आपको बता दें कि खुफिया एजेंसियों ने ऐसे प्रयासों को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है, जिनमें खालिस्तान समर्थक संगठन, खासकर सिख्स फॉर जस्टिस जेलों के भीतर बंद कैदियों को अपने नेटवर्क में शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं। हाल में हिरासत में लिए गए एक आरोपी से पूछताछ में सामने आई जानकारी ने इस पूरे नेटवर्क की जड़ें जेलों तक पहुंचने के संकेत दिए हैं।
जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपी प्रीतपाल सिंह ने खुलासा किया कि जेल में सजा काटने के दौरान ही उसे खालिस्तान समर्थक गतिविधियों से जुड़े लोगों ने अपने प्रभाव में लिया था। इसी दौरान उसे विदेश में बैठे खालिस्तानी अलगाववादी गुरपतवंत सिंह पन्नू से संपर्क करने के लिए फोन नंबर भी उपलब्ध कराया गया। जेल से बाहर आने के बाद उसने सीधे पन्नू से संपर्क स्थापित किया और कथित तौर पर आगे के काम के लिए धन भी प्राप्त किया।
जांच में सामने आया है कि प्रीतपाल सिंह पहले भी खालिस्तान समर्थक गतिविधियों में शामिल रहा था। वर्ष 2023 में उसे इसी तरह की एक घटना के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। हाल में एजेंसियों ने उसके नेटवर्क का पदार्फाश करते हुए उसे गिरफ्तार किया। आरोप है कि उसने अपने साथियों के साथ दिल्ली और पंजाब में ब्रिक्स विरोधी तथा खालिस्तान समर्थक नारे दीवारों पर लिखे, उनका वीडियो बनाया और उसे पन्नू तक पहुंचाया।
जांच का सबसे गंभीर पहलू जेल के भीतर तैयार किए जा रहे नेटवर्क से जुड़ा है। एजेंसियों का मानना है कि जेलों में मौजूद ऐसे कैदियों को निशाना बनाया जाता है जो आर्थिक रूप से कमजोर हों, कानूनी सहायता से वंचित हों या पहली बार छोटे-मोटे अपराधों में जेल पहुंचे हों। ऐसे बंदियों को पैसे, सहायता और प्रभाव का लालच देकर धीरे-धीरे कट्टरपंथी गतिविधियों में धकेलने की कोशिश की जाती है।
इस पूरे नेटवर्क में धन और हथियार पहुंचाने का तरीका भी बदल रहा है। खुफिया एजेंसियों ने पाया है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के समर्थन वाले गुट अब सीधे संपर्क और आमने-सामने धन या हथियार पहुंचाने की बजाय गुप्त स्थानों पर सामान छोड़ने की पद्धति का इस्तेमाल कर रहे हैं। सूनसान राजमार्गों, सीमावर्ती इलाकों और ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से तय स्थानों पर धन, हथियार या अन्य सामग्री छिपाई जाती है। इसके बाद स्थानीय सदस्यों को सुरक्षित मैसेजिंग एप्स के जरिए उस स्थान की जानकारी दी जाती है। प्रवासीनेटवर्क जुड़ें
एजेंसियों के मुताबिक, सीमा पार से ड्रोन या गुप्त माध्यमों के जरिए हथियार और नकदी पहुंचाकर उन्हें ऐसे स्थानों पर छिपाया जाता है, जहां से स्थानीय गुर्गे उन्हें उठा सकें। इस तरीके का सबसे बड़ा फायदा यह है कि विदेश में बैठे संचालकों और जमीन पर काम कर रहे लोगों के बीच सीधा संपर्क कम हो जाता है, जिससे पूरे नेटवर्क की पहचान करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए कठिन हो जाता है।
देखा जाये तो जेलों के इस्तेमाल का खतरा नया नहीं है। वर्ष 2016 में नाभा जेल से हुई कुख्यात फरारी ने भी आतंकवादी संगठनों और जेलों में बंद अपराधी गिरोहों के बीच संभावित गठजोड़ की ओर ध्यान खींचा था। अब प्रीतपाल सिंह के मामले ने एक बार फिर सुरक्षा एजेंसियों को चेताया है कि जेलों के भीतर होने वाली कट्टरपंथी गतिविधियों पर निगरानी और कड़ी करनी होगी। फिलहाल एजेंसियां प्रीतपाल सिंह के डिजिटल संपर्कों, धन के गुप्त लेनदेन और जेल के भीतर उसके संपर्कों की कड़ियां जोड़ रही हैं। जांच का मकसद केवल एक आरोपी तक पहुंचना नहीं, बल्कि यह पता लगाना है कि जेलों से बाहर निकलकर कितने लोग इस गुप्त नेटवर्क का हिस्सा बने और उनके पीछे विदेश में बैठे संचालकों का तंत्र कितना व्यापक है।
दूसरी ओर, जेलों में भर्ती के इस खतरे के बीच ह्यप्रहारह्ण अभियान की भूमिका भी बेहद अहम हो जाती है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ह्यप्रहारह्ण को आतंकवाद-रोधी कार्रवाई का हिस्सा बनाने और आतंकवादी नेटवर्क को 360 डिग्री से खत्म करने पर जोर दिया है। इसके तहत केवल आतंकियों तक पहुंचना नहीं, बल्कि उनकी भर्ती, धन, हथियार, संपर्क, डिजिटल नेटवर्क और विदेश में बैठे संचालकों तक पूरी कड़ी को निशाना बनाने की बात कही गई है। ऐसे में जेलों के भीतर बंद कैदियों की कट्टरपंथी गतिविधियों पर निगरानी, संदिग्ध संपर्कों की पहचान, खुफिया सूचनाओं का समय पर साझा होना और राज्य पुलिस तथा केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय इस तरह की भर्तियों को शुरूआती स्तर पर रोकने में मदद कर सकता है। ह्यप्रहारह्ण का जोर आतंकवाद के लिए अनुकूल परिस्थितियों को कम करने पर भी है, इसलिए आर्थिक रूप से कमजोर या आसानी से प्रभावित होने वाले बंदियों को कट्टरपंथी नेटवर्क के निशाने पर आने से बचाने के लिए निगरानी के साथ परामर्श और सुधारात्मक कार्यक्रम भी महत्वपूर्ण होंगे। देखना होगा कि आगे चलकर यह अभियान कितनी सफलता हासिल कर पाता है।

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