गाजियाबाद
लोनी में बदलते सियासी समीकरण, भाजपा टिकट पर बढ़ी दावेदारों की धड़कन
गुर्जर चेहरे पर भरोसे की परंपरा के बीच अन्य बिरादरियों के नेताओं ने भी ठोकी ताल, 2027 में भाजपा किसे देगी मौका?
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : गाजियाबाद की चर्चित और राजनीतिक रूप से हॉट सीट मानी जाने वाली लोनी विधानसभा में आगामी 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां लगातार अपने चरम पर हैं। कभी एक खास जातीय समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही लोनी की राजनीति में अब नए समीकरण उभरते दिखाई दे रहे हैं। भाजपा के संभावित टिकट को लेकर जहां गुर्जर समाज के नेताओं की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है, वहीं अन्य बिरादरियों से जुड़े कई नेता भी संगठन के सामने अपनी राजनीतिक जमीन और सक्रियता का हवाला देते हुए दावेदारी पेश कर रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो लोनी में भाजपा की रणनीति लंबे समय से जातीय गणित और विपक्षी प्रत्याशी के प्रभाव को ध्यान में रखकर तैयार होती रही है। यही वजह है कि पार्टी ने लगातार दो विधानसभा चुनावों में गुर्जर चेहरे पर अपना भरोसा जताया और नंद किशोर गुर्जर ने 2017 और 2022 में भाजपा को जीत दिलाई।
लोनी विधानसभा में गूर्जर वोट बैंक अब भी बड़ा फैक्टर
लोनी के चुनावी गणित में गुर्जर मतदाताओं को लंबे समय से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। स्थानीय राजनीतिक आकलनों के मुताबिक मुस्लिम मतदाताओं के बाद गुर्जर समाज की संख्या करीब 70 से 80 हजार के आसपास मानी जाती है। इसके बाद अनुसूचित जाति, ब्राह्मण, त्यागी, जाट समेत अन्य बिरादरियों का प्रभाव है। विश्वकर्मा समाज की भी क्षेत्र में अच्छी-खासी मौजूदगी मानी जाती है। इसके अलावा प्रवासी समुदाय भी बड़ी संख्या में लोनी में निवास कर रहा है
यही सामाजिक समीकरण भाजपा के लिए गुर्जर चेहरे को प्राथमिकता देने का एक प्रमुख आधार रहा है। हालांकि बदलते राजनीतिक माहौल में अब सवाल यह है कि क्या पार्टी आगामी चुनाव में भी इसी रणनीति को दोहराएगी या फिर किसी नए सामाजिक समीकरण के साथ आगे बढ़ेगी?
गुर्जर चेहरे के सामने गैर-गुर्जर दावेदारों की चुनौती
लोनी में भाजपा के भीतर टिकट की दावेदारी केवल एक बिरादरी तक सीमित नहीं है। गैर-गुर्जर समाज से जुड़े कई नेता भी लगातार अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा रहे हैं। पूर्व चेयरमैन मनोज धामा भी लोनी में चुनाव लड़ चुके हैं और क्षेत्र में उनका अपना राजनीतिक आधार माना जाता है। उनकी पत्नी रंजीता धामा ने पिछले विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़कर 27 हजार से अधिक वोट हासिल किए थे। जिस कारण विपक्षी प्रत्याशी मदन भैया को हार का सामना करना पड़ा था
इसके अलावा भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. प्रमेंद्र जांगड़ा विश्वकर्मा समाज से आते हैं और लोनी क्षेत्र में उनकी सक्रियता भी राजनीतिक चर्चा का विषय रही है। ऐसे में भाजपा के सामने टिकट चयन के दौरान सामाजिक प्रतिनिधित्व और चुनावी जीत—दोनों के बीच संतुलन साधने की चुनौती रहेगी। इसके अलावा सभासद रामनिवास त्रिपाठी भी विधायक की दौड़ में शामिल हैं वह प्रवासी समुदाय की बढ़ती संख्या को देखते हुए अपना दावा ठोक रहे हैं
विपक्षी रणनीति भी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती
लोनी की राजनीति में विपक्षी दलों की रणनीति भी भाजपा के टिकट समीकरणों को प्रभावित करती रही है। सपा-रालोद गठबंधन के दौर में मदन भैया जैसे प्रभावशाली गुर्जर चेहरे का चुनाव मैदान में उतरना भाजपा के लिए सीधी चुनौती माना गया।
ऐसे में भाजपा के लिए गुर्जर प्रत्याशी उतारने की रणनीति केवल जातीय समीकरण तक सीमित नहीं रही, बल्कि विपक्ष के प्रभाव को काटने की राजनीतिक रणनीति के तौर पर भी देखी जाती रही है। यही कारण है कि पार्टी ने लगातार दो चुनावों में नंद किशोर गुर्जर पर भरोसा जताया।
गुटबाजी ने बढ़ाई टिकट की जंग
इधर सितंबर-अक्टूबर 2026 के दौरान लोनी भाजपा की अंदरूनी राजनीति भी चर्चाओं में रही है। वर्तमान विधायक नंद किशोर गुर्जर और पार्टी के ही कुछ स्थानीय नेताओं के बीच राजनीतिक खींचतान की खबरों ने संगठन के भीतर चल रही हलचल को और हवा दी है।
पूर्व ब्लॉक प्रमुख अनिल कसाना, डॉ. विनोद बंसल और ईश्वर मावी समेत कई नेताओं के नाम स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में सामने आते रहे हैं। अलग-अलग बिरादरियों और भाजपा के विभिन्न धड़ों की ओर से हुई बैठकों और पंचायतों ने भी इस चर्चा को बल दिया है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व और आगामी चुनावी रणनीति को लेकर मंथन तेज हो चुका है।
65 हजार के करीब SC वोट और बदलता समीकरण
लोनी विधानसभा में अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या भी करीब 65 हजार बताई जाती है। इसके अलावा ब्राह्मण, त्यागी, जाट, विश्वकर्मा और अन्य सामाजिक समूह भी चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।
यही वजह है कि भाजपा के सामने अब केवल परंपरागत वोट बैंक को साधने की चुनौती नहीं है, बल्कि अलग-अलग सामाजिक समूहों को साथ लेकर चलने की भी जरूरत है। टिकट के संभावित दावेदार इसी बदलते समीकरण को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश में जुटे हैं।
2027 में दोहराएगी पुराना फॉर्मूला या चलेगी नई चाल?
लोनी भाजपा के लिए असली सवाल अब यही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी पुराने गुर्जर फॉर्मूले पर भरोसा कायम रखेगी या सामाजिक समीकरणों को देखते हुए किसी नए चेहरे को मौका देगी।
एक तरफ मौजूदा विधायक नंद किशोर गुर्जर का राजनीतिक अनुभव और लगातार दो चुनावों में जीत का रिकॉर्ड है, तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर उभरती असंतुष्टि, गुटीय खींचतान और गैर-गुर्जर दावेदारों की बढ़ती सक्रियता भी संगठन के लिए नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
आखिरकार भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व और संगठन किस चेहरे को चुनावी मैदान में उतारता है, यह आने वाले समय में ही साफ होगा। लेकिन इतना तय है कि लोनी में 2027 की टिकट की जंग सिर्फ एक सीट की दावेदारी नहीं, बल्कि बदलते जातीय और राजनीतिक समीकरणों की अग्निपरीक्षा बनने जा रही है।
