गाजियाबाद

लोनी में होली के रंगों के बीच सियासी चर्चाएं                          

परंपरा बनाम राजनीति की बहस तेज

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
  लोनी गाजियाबाद :  होली का पर्व पारंपरिक रूप से आपसी भाईचारे, सौहार्द और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इस बार लोनी विधानसभा में आयोजित होली मिलन समारोहों ने राजनीतिक हलकों में भी हलचल पैदा कर दी। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इन आयोजनों को लेकर आम जनता के बीच से कई तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं।
विधायक नंदकिशोर गुर्जर का होली मिलन समारोह
लोनी से दो बार विधायक चुने गए नंदकिशोर गुर्जर का होली मिलन समारोह इस बार विशेष रूप से चर्चा में रहा। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक की उपस्थिति ने आयोजन को राजनीतिक महत्व प्रदान किया। साथ ही रालोद के वरिष्ठ नेता कपिल चौधरी और सतवीर प्रधान की मौजूदगी ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
नंदकिशोर गुर्जर को क्षेत्र में एक कुशल रणनीतिकार, जुझारू और बेबाक नेता के रूप में देखा जाता है। विकास कार्यों को लेकर उनका आक्रामक रुख और सक्रियता समर्थकों के बीच उनकी मजबूत छवि बनाता है। स्थानीय स्तर पर कुछ सभासद, ग्राम प्रधान और क्षेत्र पंचायत सदस्य उनके साथ खड़े दिखाई देते हैं। वहीं होली मिलन में शामिल भीड़ को उनके समर्थक जनसमर्थन का संकेत मान रहे हैं।
मनोज धामा के कार्यक्रम में दिखा अलग संदेश
दूसरी ओर, पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष मनोज धामा, जो वर्तमान में राष्ट्रीय लोक दल से जुड़े हैं, उनके होली मिलन समारोह ने भी सियासी चर्चा को हवा दी। कार्यक्रम में उनकी पत्नी और वर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष रंजीता धामा की सक्रिय भागीदारी रही।
खतौली विधायक मदन भैया की उपस्थिति को रालोद का स्वाभाविक समर्थन माना गया। हालांकि चर्चा तब तेज हुई जब भाजपा के वरिष्ठ चेहरे,अनिल कसाना, विनोद बंसल और योगेंद्र मावी भी मंच पर दिखाई दिए। और उन्होंने आपसी भाईचारे का संदेश दिया
बगावत की आहट या सामाजिक परंपरा?
इन आयोजनों को लेकर लोगों में दो तरह की राय सामने आ रही है।
एक पक्ष इसे भाजपा के भीतर संभावित असंतोष या भविष्य की राजनीतिक रणनीति के संकेत के रूप में देख रहा है। विपक्षी मंच पर विभिन्न दलों के नेताओं की उपस्थिति को कुछ लोग आगामी चुनावी समीकरणों से जोड़कर देख रहे हैं।
वहीं दूसरा पक्ष इसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक परंपरा का हिस्सा मानता है, जहां व्यक्तिगत संबंध और सामाजिक संपर्क अक्सर दलगत सीमाओं से ऊपर होते हैं। होली जैसे पर्व पर एक-दूसरे के कार्यक्रम में शामिल होना लंबे समय से चली आ रही व्यवहारिक परंपरा है।
क्या हर कार्यक्रम को चुनाव से जोड़ना उचित?
राजनीतिक विश्लेषण अपनी जगह है, लेकिन यह भी सच है कि होली मिलन जैसे आयोजन सामाजिक सौहार्द और आपसी रिश्तों को मजबूत करने का माध्यम भी होते हैं। चुनाव से पहले किसी भी सामाजिक कार्यक्रम को सीधे राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर को सीमित कर सकता है।
मनोज धामा के कार्यक्रम में दिखाई दिया आपसी सौहार्द और भाईचारे का वातावरण इस बात का संकेत भी देता है कि राजनीति के साथ-साथ सामाजिक संबंधों की परंपरा आज भी जीवित है।
निष्कर्ष
इस बार होली के रंग केवल अबीर-गुलाल तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने लोनी की राजनीति में नए प्रश्न भी खड़े कर दिए हैं। कौन किसके साथ है, कौन शिष्टाचार निभा रहा है और कौन भविष्य की रणनीति गढ़ रहा है यह समय के साथ स्पष्ट होगा।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि लोनी की सियासत में रंगों के साथ-साथ समीकरण भी बदलते दिखाई दे रहे हैं। लेकिन साथ ही यह याद रखना भी आवश्यक है कि त्योहारों का मूल उद्देश्य आपसी भाईचारा और सामाजिक एकता है, जिसे राजनीतिक चश्मे से देखने से पहले संतुलन और विवेक बनाए रखना चाहिए।
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