बागपत
इंटरव्यू: बड़ौत में CNG दाह संस्कार—पर्यावरण बचाने की नई पहल

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बागपत। बड़ौत की एक बड़ी पहल—परंपरा से आधुनिकता की ओर
बागपत जनपद के बड़ौत में पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। नगर पालिका परिषद द्वारा CNG दाह संस्कार गृह का निर्माण न केवल अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को आधुनिक बना रहा है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक मजबूत संदेश दे रहा है।
प्रश्न: बड़ौत में CNG दाह संस्कार की शुरुआत को आप किस रूप में देखते हैं?
अश्वनी तोमर (नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिनिधि):
यह बड़ौत के लिए एक ऐतिहासिक कदम है। बड़ौत नगर पालिका की चेयरमैन बबीता तोमर (पत्नी अश्वनी तोमर) के नेतृत्व में यह कार्य पूरा हुआ है।
पहले पारंपरिक तरीके से एक शव के अंतिम संस्कार में लगभग 5 कुंतल लकड़ी लगती थी। लेकिन जब लकड़ी सूखती है तो उसका वजन लगभग ढाई कुंतल रह जाता है। यानी एक शव के लिए करीब 2 पेड़ों की आवश्यकता पड़ती थी।
प्रश्न: इसका पर्यावरण पर क्या असर पड़ता था?
अश्वनी तोमर:
अगर बड़ौत के औसत की बात करें तो रोजाना 8 से 10 अंतिम संस्कार होते हैं। इसका मतलब है कि प्रतिदिन लगभग 16 से 20 पेड़ कट जाते थे।
इतना ही नहीं, लकड़ी जलने से निकलने वाला धुआं भी वातावरण को गंभीर रूप से प्रदूषित करता था। अब CNG दाह संस्कार के माध्यम से हम न केवल पेड़ों को बचा रहे हैं, बल्कि वायु प्रदूषण में भी भारी कमी ला रहे हैं।
प्रश्न: CNG दाह संस्कार की विशेषताएं क्या हैं?
अश्वनी तोमर:
110 फीट लंबी चिमनी लगाई गई है, जिससे धुआं ऊंचाई पर जाकर फैलता है और आसपास का क्षेत्र प्रदूषण मुक्त रहता है।
लकड़ी की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
अंतिम संस्कार की प्रक्रिया तेज, स्वच्छ और व्यवस्थित होती है।
प्रश्न: क्या नगर पालिका ने पहले भी इस दिशा में कोई पहल की थी?
अश्वनी तोमर:
जी हां, CNG दाह संस्कार से पहले ही नगर पालिका ने “मोक्ष रथ” वाहन की व्यवस्था शुरू की थी, जो पूरी तरह निशुल्क है।
यह वाहन शव को घर से श्मशान घाट तक सम्मानपूर्वक पहुंचाने का कार्य करता है। इससे गरीब और जरूरतमंद परिवारों को बहुत राहत मिली है।
इस पहल को समाजसेवियों का भी भरपूर समर्थन मिल रहा है।
डॉ दिनेश बंसल, जो हरित प्राण ट्रस्ट के अध्यक्ष होने के साथ-साथ मैनावती हॉस्पिटल के ऑनर भी हैं, इस अभियान को एक जन आंदोलन का रूप दे चुके हैं।
डॉ दिनेश बंसल का कहना है:
“सांसे हो रही कम, आओ पेड़ लगाए हम—यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। CNG दाह संस्कार जैसी पहल से जहां पेड़ों की कटाई रुकेगी, वहीं पर्यावरण को भी नई जिंदगी मिलेगी।”
पेड़ लगाने का अनोखा मॉडल—हर मरीज के साथ एक पौधा
डॉ दिनेश बंसल का कार्य वास्तव में प्रेरणादायक है।
वे अपने अस्पताल (मैनावती हॉस्पिटल) में आने वाले हर OPD मरीज को एक पौधा उपहार में देते हैं।
केवल पौधा देना ही नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का नाम-पता भी दर्ज किया जाता है।
समय-समय पर उस पौधे का हाल-चाल भी लिया जाता है, ताकि वह वास्तव में पेड़ बन सके।
इस अनोखी पहल के चलते अब तक उनके द्वारा लगाए गए पेड़ों की संख्या सवा लाख (1.25 लाख) के पार पहुंच चुकी है।
यह एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज को जोड़ने वाली पर्यावरण क्रांति बन चुकी है।
प्रश्न: क्या बड़ौत इस दिशा में एक उदाहरण बन सकता है?
अश्वनी तोमर:
बिल्कुल। चेयरमैन बबीता तोमर के नेतृत्व में बड़ौत नगर पालिका परिषद ने यह साबित कर दिया है कि यदि इच्छाशक्ति हो, तो छोटे शहर भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।
यह मॉडल पूरे प्रदेश और देश के लिए प्रेरणा बन सकता है।
प्रश्न: आम जनता को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
अश्वनी तोमर:
मैं सभी नागरिकों से अपील करता हूं कि वे इस आधुनिक और पर्यावरण हितैषी व्यवस्था को अपनाएं। साथ ही, पेड़ लगाने और उन्हें बचाने का संकल्प लें।
पत्रकार (सुरेंद्र मलानिया)
बड़ौत में CNG दाह संस्कार की शुरुआत एक क्रांतिकारी बदलाव है। जहां पहले हर दिन लगभग 20 पेड़ कटते थे, अब वही पेड़ बचेंगे।
इसके साथ ही निशुल्क “मोक्ष रथ” सेवा और डॉ दिनेश बंसल जैसे समाजसेवियों की पहल इस मिशन को और मजबूत बना रही है।
एक तरफ आधुनिक तकनीक, दूसरी तरफ जन-जागरूकता—इन दोनों के संगम से बड़ौत आज पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक नई पहचान बना रहा है।
अब संदेश साफ है—
“पर्यावरण बचाना है, तो परंपराओं में बदलाव लाना ही होगा।”



