नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी, गाजियाबाद। लोनी नगरपालिका में इन दिनों सफाई व्यवस्था कम और “सफाई व्यवस्था का अभिनय” ज्यादा देखने को मिल रहा है। कागज़ों में सफाई कर्मचारियों के बलबूते शहर चमकना चाहिए , लेकिन जमीन पर हालत ऐसी है कि कूड़े के ढेर और बदबू ने लोगों का स्वागत द्वार संभाल रखा है।
पालिका परिसर में आयोजित “लोनी के सर्वांगीण विकास, जनसेवा और आपके विश्वास के 3 सफल व समर्पित वर्ष” कार्यक्रम में विकास के दावे खूब गूंजे, लेकिन जनता पूछती रही कि अगर यही विकास है तो बदहाली किसे कहते हैं? सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि कार्यक्रम नगरपालिका परिसर में हुआ, मगर चेयरमैन रंजीता धामा उससे दूरी बनाए रहीं। अब यह दूरी राजनीतिक थी या सफाई व्यवस्था की दुर्गंध से बचने की कोशिश, यह जनता खुद समझदार है।
पांच साल का ठेका, लेकिन तैयारी पांच दिन वाली भी नहीं
सभासदों का आरोप है कि बोर्ड बैठक में सफाई व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए क्षेत्र को चार जोन में बांटने का प्रस्ताव पिछली बोर्ड बैठक में रखा गया था। सोच यह थी कि अलग-अलग ठेके होंगे तो सफाई कंपनी की जवाबदेही तय होगी।
लेकिन यहां तो लोकतंत्र ने अचानक यू-टर्न ले लिया और पूरा ठेका एक ही कंपनी को पांच साल के लिए सौंप दिया गया।
अब जनता पूछ रही है ,
क्या यह सफाई का ठेका था या स्थायी राजनीतिक रिश्तेदारी का अनुबंध?
टेंडर में नियम गायब, संसाधन आधे
टेंडर की शर्तें कहती हैं कि 55 वार्डों में लगभग 1960 सफाई कर्मचारी तैनात होंगे। हर 10 हजार आबादी पर 28 कर्मचारी रहेंगे।
लेकिन जमीन पर हालात यह हैं कि कई वार्डों में कर्मचारी ऐसे दिखाई दे रहे हैं जैसे चुनाव के बाद नेता कभी-कभार।
ट्रैक्टर कम, टीपर गायब, कर्मचारी अधूरे… लेकिन काम शुरू कराने की अनुमति पूरी रफ्तार से दे दी गई। लगता है अधिकारियों ने संसाधनों की जांच फाइल देखकर ही कर ली होगी। शायद कागज़ों में मशीनें इतनी तेज दौड़ रही थीं कि जमीन पर उतरना भूल गईं।
सवाल बहुत हैं, जवाब छुट्टी पर
अब शहर में कुछ सीधे सवाल घूम रहे हैं
बिना पर्याप्त संसाधनों के कंपनी को काम शुरू कराने की अनुमति किसने दी?
क्या अधिकारियों ने कर्मचारियों की गिनती भी की थी या सिर्फ हस्ताक्षर गिने गए?
टेंडर की शर्तों का पालन करवाने वाले अधिकारी आखिर किस काम की सफाई में व्यस्त हैं?
जनता का कूड़ा कौन उठाएगा और जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
राजनीतिक संरक्षण या सफाई का “सुरक्षा कवच”?
पालिका गलियारों में चर्चा है कि कंपनी को दो बड़े राजनीतिक चेहरों का संरक्षण प्राप्त है। शायद यही वजह है कि शिकायतें बढ़ रही हैं लेकिन कार्रवाई फाइलों में आराम फरमा रही है।
दिलचस्प यह भी है कि जो नेता आम दिनों में एक-दूसरे को देखना पसंद नहीं करते, वे इस मामले में आश्चर्यजनक एकता दिखा रहे हैं। जनता कह रही है
लगता है कूड़े ने राजनीति में भी स्वच्छता अभियान चला दिया है।
जनता बदबू में, दावे खुशबू में
लोनी की गलियों में गंदगी, जलभराव और बदहाल सफाई व्यवस्था ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। लेकिन सरकारी दावों में सब कुछ “व्यवस्थित” बताया जा रहा है।
शायद प्रशासन की नजर में सफाई का मतलब अब कूड़ा हटाना नहीं, बल्कि शिकायतों को दबाना रह गया है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि कंपनी वास्तव में टेंडर की शर्तों के अनुसार काम करती है या फिर राजनीतिक संरक्षण, आधे संसाधनों और पूरे आत्मविश्वास के सहारे ही लोनी की सफाई व्यवस्था चलती रहेगी।
फिलहाल लोनी की जनता यही पूछ रही है
“स्वच्छ लोनी का सपना कब पूरा होगा, या यह भी सिर्फ पोस्टर और भाषणों तक ही सीमित रहेगा?”


