जायरा वसीम के लिए देश से बड़ा है धर्म !
नई दिल्ली। देखा जाये तो जायरा वसीम के सवालों के साथ कुछ और सवाल भी खड़े होते हैं। सबसे पहला सवाल यही है कि स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में बच्चियों की भागीदारी आखिर समस्या क्यों बन गई? क्या मंच पर नृत्य करना अपने आप में बच्चियों की गरिमा, शिक्षा या स्वतंत्रता के खिलाफ है?
कश्मीर में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान बच्चियों के नृत्य का एक वीडियो सामने आने के बाद पूर्व अभिनेत्री जायरा वसीम ने जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। जायरा वसीम ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पूछा कि धार्मिक और सामुदायिक उद्देश्यों के लिए गठित संस्था के बैनर तले आयोजित कार्यक्रम में छोटी बच्चियों से मंच पर नृत्य क्यों कराया गया? उनका तर्क है कि बच्चों को केवल नृत्य या मनोरंजन तक सीमित करने की बजाय उन्हें सोचने, सीखने, सृजन करने, चर्चा करने और समाज में योगदान देने के अवसर मिलने चाहिए।
देखा जाये तो जायरा वसीम के सवालों के साथ कुछ और सवाल भी खड़े होते हैं। सबसे पहला सवाल यही है कि स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में बच्चियों की भागीदारी आखिर समस्या क्यों बन गई? क्या मंच पर नृत्य करना अपने आप में बच्चियों की गरिमा, शिक्षा या स्वतंत्रता के खिलाफ है? यदि प्रस्तुति बच्चों की स्वेच्छा, विद्यालय की गतिविधि और राष्ट्रीय पर्व के उत्सव का हिस्सा है, तो क्या उसे केवल इसलिए अनुचित मान लिया जाना चाहिए क्योंकि वह धार्मिक संस्था से जुड़े स्कूल में आयोजित हुई? और यदि यही कार्यक्रम किसी दूसरी संस्था के बैनर तले होता, तो क्या जायरा की आपत्ति उतनी ही तीखी होती?
यहां एक विडंबना भी दिखाई देती है। जायरा वसीम स्वयं कभी उसी फिल्मी दुनिया का हिस्सा थीं, जिसे उन्होंने बाद में अपने धार्मिक विश्वासों के साथ टकराव का कारण बताते हुए छोड़ दिया। दंगल से पहचान बनाने के बाद उन्होंने सीक्रेट सुपरस्टार और द स्काई इज पिंक में काम किया। 2019 में उन्होंने अभिनय से अलग होने की घोषणा करते हुए कहा था कि फिल्म उद्योग उनके ईमान और धार्मिक आस्था के साथ टकरा रहा था।
यहीं उनसे दूसरा बड़ा सवाल पूछा जाना चाहिए कि अगर कभी फिल्मों में काम करना आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और चुनाव था, तो आज किसी दूसरी बच्ची के सांस्कृतिक प्रदर्शन को उसकी स्वतंत्रता और चुनाव की बजाय धार्मिक कसौटी से क्यों देखा जा रहा है? बच्चों को सोचने की आजादी देने की बात बिल्कुल सही है, लेकिन क्या उस आजादी में नृत्य, संगीत, कला और राष्ट्रीय पर्व मनाने की स्वतंत्रता भी शामिल नहीं होनी चाहिए?



