ललितपुर

हिन्दी सिर्फ भाषा नहीं, भारतीय संस्कृति की धुरी भी है

भाषा ने मानव सभ्यता को संवाद, स्मृति और संस्कृति की शक्ति दी : सिद्धार्थ शर्मा

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
ललितपुर। हिन्दी दिवस के अवसर पर स्तम्भकार सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य की स्मृति, संवेदना, संस्कृति और सभ्यता की सबसे सशक्त वाहक है। भाषा ने मनुष्य को मनुष्य से जोडऩे, अनुभवों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने और सभ्यताओं को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस दृष्टि से हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की धुरी है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में हिन्दी को भारत माता की एक आंख और देश की सभी प्रादेशिक भाषाओं को दूसरी आंख के रूप में देखा जा सकता है। दोनों आंखें स्वस्थ रहेंगी तभी देश अपनी विविधता को समग्रता में देख सकेगा। इसलिए किसी भाषा को दूसरी भाषा के विरुद्ध खड़ा करने के बजाय भाषाओं के बीच सहकार, सम्मान और समन्वय की भावना विकसित करने की आवश्यकता है। सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि भाषा मनुष्य को प्रकृति का अनुपम वरदान है। यदि मनुष्य को भाषा का वरदान नहीं मिला होता तो उसके अनुभव उसी तक सीमित रह जाते। शब्दों ने मनुष्य के बीच पुल का काम किया और परिवार, समाज, राष्ट्र तथा पूरी मानव सभ्यता को संवाद की शक्ति प्रदान की। इसी संवाद ने ज्ञान और अनुभव को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का मार्ग बनाया। उन्होंने कहा कि डिजिटल और इंटरनेट के दौर ने हिन्दी के सामने संभावनाओं का नया संसार खोल दिया है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, डिजिटल पत्रकारिता, ऑनलाइन शिक्षा और मनोरंजन के माध्यम से हिन्दी की पहुंच पहले की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक हुई है। देवनागरी में लिखने-पढऩे और हिन्दी में डिजिटल सामग्री तैयार करने की सुविधाओं ने नई पीढ़ी को भी हिन्दी से जोडऩे का काम किया है। हिन्दी आज भारत की सीमाओं से बाहर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है और उसका विशाल जनाधार उसकी बड़ी ताकत है। सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि हिन्दी दिवस पर केवल अंग्रेजी के प्रभाव को कोसना पर्याप्त नहीं है। भाषा की प्रतिष्ठा उसके बोलने वालों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति से भी जुड़ी होती है। उत्तर भारत के अनेक लोग रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में दिल्ली, मुंबई तथा देश के अन्य महानगरों की ओर जाते हैं और अपने साथ हिन्दी को भी लेकर जाते हैं। लेकिन यदि हिन्दी भाषी समाज बेरोजगारी, गरीबी और अभाव से जूझता रहेगा तो केवल संख्याबल के आधार पर भाषा को अपेक्षित सम्मान नहीं मिल सकता। उन्होंने कहा कि भाषा किसी समाज की शक्ति का परिणाम भी होती है। जिन देशों का आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव दुनिया के बड़े हिस्से तक पहुंचा, उनकी भाषाओं का प्रभाव भी व्यापक हुआ। अंग्रेजी के वैश्विक प्रभाव के पीछे भी राजनीतिक, आर्थिक और औपनिवेशिक विस्तार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में हिन्दी को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाने के लिए केवल भावनात्मक आग्रह पर्याप्त नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, व्यापार, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्रों में हिन्दी का प्रभावी प्रयोग आवश्यक है। सिद्धार्थ शर्मा ने हिन्दी की सबसे बड़ी विशेषता उसकी ग्रहणशीलता को बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश की दीर्घ भाषायी परंपरा से विकसित हिन्दी ने समय-समय पर अनेक भाषाओं और बोलियों से शब्द और भाव ग्रहण किए हैं। अवधी, ब्रज, बुंदेली, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी, हरियाणवी, मगही सहित अनेक लोकभाषाओं और बोलियों की संवेदनाएं हिन्दी के व्यापक संसार को समृद्ध करती हैं। यही विविधता हिन्दी को जीवंत और व्यापक बनाती है। उन्होंने कहा कि हिन्दी में भारत का हृदय धड़कता है। इसमें गांव की मिट्टी की गंध, लोकगीतों की मिठास, कबीर की निर्भीकता, तुलसी की लोकमंगल भावना और प्रेमचंद की सामाजिक चेतना दिखाई देती है। साथ ही आधुनिक भारत की बदलती आकांक्षाएं भी हिन्दी के माध्यम से अभिव्यक्त हो रही हैं। हिन्दी खेत-खलिहान से लेकर विश्वविद्यालयों तक, लोकगीत से सिनेमा तक तथा साहित्य से डिजिटल मीडिया तक लगातार अपना विस्तार कर रही है। उन्होंने बताया कि 14 सितम्बर 1949 हिन्दी के इतिहास में महत्वपूर्ण दिन है। इसी दिन संविधान सभा ने हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। इसी ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि हिन्दी दिवस का उद्देश्य केवल एक दिन हिन्दी के प्रति उत्साह प्रदर्शित करना नहीं होना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दी ज्ञान-विज्ञान, रोजगार, तकनीक और प्रशासन की सहज भाषा बने तथा विश्व के साथ संवाद करने में सक्षम आधुनिक भाषा के रूप में निरंतर विकसित हो। सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि हिन्दी को सम्मान दिलाने का बेहतर रास्ता दूसरी भाषाओं का विरोध करना नहीं, बल्कि हिन्दी को इतना सक्षम बनाना है कि वह किसी भाषा से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय ज्ञान की साझेदार बन सके। भाषाएं एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की सहयात्री हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा जब वह अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रहते हुए आधुनिक विज्ञान, तकनीक और वैश्विक ज्ञान के साथ कदम मिलाकर चलेगी।
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