बागपत
22 साल में बेरोजगारी, 60 में रिटायरमेंट और 76 में देश की कमान—व्यवस्था से एक सवाल!
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बागपत। देश में इन दिनों युवाओं के भविष्य को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा है। सरकार युवाओं से कहती है—कम उम्र में देश की सेवा करो, कुछ वर्षों तक नौकरी करो और फिर आगे अपने भविष्य का इंतजाम खुद करो। दूसरी तरफ उसी देश की राजनीति में उम्र की कोई अधिकतम सीमा नहीं है।
यहीं से व्यंग्य पैदा होता है—
“साहब! नौकरी में 60 साल बहुत ज्यादा हैं, लेकिन राजनीति में 60 साल शायद शुरुआत माने जाते हैं!”
केंद्र सरकार के सामान्य नियमों के अनुसार सरकारी कर्मचारी 60 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त होता है। लेकिन राजनीति में ऐसी अधिकतम उम्र सीमा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को हुआ था और 2026 में वे 76 वर्ष के हैं। वे 9 जून 2024 को तीसरी बार प्रधानमंत्री बने।
अब सवाल किसी व्यक्ति विशेष की क्षमता पर सवाल उठाने का नहीं, व्यवस्था की समानता पर सवाल उठाने का है।
युवा को चार साल, नेता को कितने साल?
एक तरफ 18-22 साल का नौजवान भर्ती की तैयारी करता है। देश की सेवा करने का सपना देखता है। प्रशिक्षण लेता है। कठिन परिस्थितियों में काम करता है और फिर कुछ वर्षों बाद उसके सामने सवाल खड़ा हो जाता है—
“अब आगे क्या?”
तो क्या सरकार को यह भी नहीं सोचना चाहिए कि जिस युवा ने देश की सेवा में अपना महत्वपूर्ण समय दिया, उसकी आगे की जिंदगी कैसे सुरक्षित होगी?
कहीं ऐसा न हो कि अगली बार भर्ती निकले और युवा कहे—
“भाई साहब, फॉर्म रहने दो… चार साल बाद फिर बेरोजगारी की लाइन में लगना है!”
यह मजाक नहीं, नीति की गंभीर चुनौती है।
अब जरा राजनीति का नियम भी बना दीजिए!
यदि देश युवाओं के लिए उम्र और सेवा अवधि निर्धारित कर सकता है तो एक सवाल यह भी है—
राजनीति के लिए भी कोई अधिकतम उम्र क्यों नहीं?
एक प्रस्ताव यह हो सकता है कि 60 वर्ष के बाद कोई व्यक्ति सक्रिय राजनीतिक पद पर न रहे। सांसद, विधायक, मंत्री या अन्य निर्वाचित राजनीतिक पद के लिए अधिकतम आयु सीमा तय हो।
और पद छोड़ने के बाद?
बस फिर वही जिंदगी जो आम आदमी जीता है।
न कोई आजीवन राजनीतिक विशेषाधिकार, न ऐसी पेंशन व्यवस्था जिसे लेकर जनता सवाल उठाए। पूर्व जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सुविधाओं और पेंशन की व्यवस्था की भी समीक्षा हो और जनता के पैसे का उपयोग पारदर्शी तरीके से हो।
लेकिन क्षमता अच्छी हो तो?
यहां एक और सवाल आता है—अगर कोई व्यक्ति 60 वर्ष के बाद भी पूरी तरह सक्षम है तो?
तो फिर यही सिद्धांत सरकारी कर्मचारियों पर भी लागू होना चाहिए।
पहले कार्यक्षमता देखिए, फिर उम्र।
अगर किसी कर्मचारी की क्षमता, अनुभव और कार्यशैली अच्छी है तो उसे उपयुक्त व्यवस्था के तहत आगे काम करने का अवसर क्यों न मिले? और यदि उम्र ही अंतिम पैमाना है, तो वही पैमाना राजनीति में भी लागू होना चाहिए।
यानी नियम ऐसा हो जो व्यक्ति देखकर नहीं, व्यवस्था देखकर बनाया जाए।
76 की उम्र में प्रधानमंत्री क्यों नहीं?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 76 वर्ष के हैं और तीसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री हैं।
इस पर सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “मोदी जी को प्रधानमंत्री बनने की जरूरत क्या थी?”
लोकतंत्र में जनता ने चुनाव के माध्यम से अपना निर्णय दिया है और संवैधानिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री पद के लिए कोई अधिकतम आयु सीमा निर्धारित नहीं है।
असल सवाल यह होना चाहिए—
“क्या भविष्य में भारत ऐसी व्यवस्था बनाएगा जिसमें प्रधानमंत्री से लेकर पार्षद तक सक्रिय राजनीति में रहने की अधिकतम उम्र निर्धारित हो?”
क्योंकि अगर हम मानते हैं कि युवा देश का भविष्य हैं तो उन्हें सिर्फ भाषणों में भविष्य कहने से काम नहीं चलेगा।
उन्हें वर्तमान में भी मौका देना पड़ेगा।
देश को बूढ़ी राजनीति नहीं, संतुलित राजनीति चाहिए
यह लेख बुजुर्गों के खिलाफ नहीं है। अनुभव की अपनी कीमत है। लेकिन राजनीति में भी पीढ़ियों का संतुलन जरूरी है।
एक तरफ अनुभवी लोगों का ज्ञान रहे, दूसरी तरफ युवाओं के लिए रास्ते खुलें।
और अगर सरकार यह तय करती है कि 60 साल के बाद सरकारी कर्मचारी को घर जाना है, तो जनता यह सवाल पूछने का अधिकार भी रखती है—
“जिस व्यवस्था में 60 साल का कर्मचारी रिटायर हो जाता है, उसी व्यवस्था में 70-80 साल की उम्र तक राजनीतिक पद क्यों जारी रहें?”
और अगर जवाब है कि “क्षमता है तो उम्र बाधा नहीं होनी चाहिए”, तो फिर यही कसौटी नौकरी करने वाले आम आदमी पर भी लागू होनी चाहिए।
युवा को चार साल बाद बेरोजगारी और नेता को उम्र की कोई सीमा नहीं—यह अंतर ही आज की सबसे बड़ी बहस है।
आखिर लोकतंत्र में नियम ऐसा क्यों न हो—
न उम्र देखकर किसी को अयोग्य समझा जाए, न उम्र देखकर किसी को हमेशा के लिए योग्य मान लिया जाए। पहले कार्यक्षमता, फिर जिम्मेदारी; और जिम्मेदारी के बाद आम आदमी जैसी जिंदगी।
यही बहस शायद उस युवा को भी भरोसा दे सकेगी जो आज नौकरी का फॉर्म हाथ में लेकर सोच रहा है—
“चार साल नौकरी करूंगा, उसके बाद मेरा क्या होगा?”



