ललितपुर

साहिर-सिर्फ गीतों के जादूगर नहीं, समाज की कड़वी हकीकत और इंकलाब के भी थे पैरोकार

इंसानियत का संदेश, तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा

जैसी कालजयी पंक्तियों से साहिर ने धर्म से ऊपर मानवता को रखा।
नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
ललितपुर। हिंदी सिनेमा के इतिहास में यूँ तो कई गीतकार हुए, लेकिन साहिर लुधियानवी एक ऐसे युगद्रष्टा कवि थे, जिनकी कलम ने केवल प्रेम की कोमलता ही नहीं, बल्कि समाज के तीखे संघर्षों और इंकलाबी तेवरों को भी कागज पर उतारा। आज 8 मार्च को उनकी जयंती के अवसर पर स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार, लेखक सिद्धार्थ शर्मा बताते हैं कि उनकी रचनाधर्मिता को याद करना प्रासंगिक है, क्योंकि उनकी शायरी में मोहब्बत के साथ संघर्ष और इंकलाब के साथ आध्यात्मिकता का एक अनूठा समन्वय मिलता है। साहिर की शायरी में प्रेम केवल व्यक्तिगत भावनाओं तक सीमित नहीं था। जहाँ उन्होंने कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है जैसी रूमानी नज्म लिखी, वहीं चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों के जरिए प्रेम की विडंबना और सामाजिक वर्जनाओं के बीच फंसे रिश्तों के दर्द को भी उकेरा। उनके लिए प्रेम में समर्पण से अधिक समानता और सम्मान का महत्व था। साहिर समाजवादी विचारधारा से गहरे प्रभावित थे। फिल्म प्यासा का गीत ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है। पूँजीवादी व्यवस्था की बेरुखी पर सबसे बड़ा कटाक्ष माना जाता है। वहीं फिल्म साधना में उन्होंने औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया। लिखकर पितृसत्तात्मक सोच और नारी शोषण के विरुद्ध बुलंद आवाज उठाई। साहिर की कलम का एक सिरा जहाँ विद्रोह से जुड़ा था, वहीं दूसरा सिरा आध्यात्मिकता को छूता था। बरसात की रात की अमर कव्वाली ना तो कारवां की तलाश है। हो या फिर मन रे तू काहे न धीर धरे और तोरा मन दर्पण कहलाए जैसे गीत, ये इंसान को खुद से साक्षात्कार कराने और ईश्वर से जुडऩे का मार्ग दिखाते हैं। निर्माता-निर्देशक बी.आर. चोपड़ा और साहिर की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को विचारोत्तेजक और सामाजिक बदलाव की प्रेरणा देने वाले गीत दिए। चाहे वह नया दौर का संघर्ष हो, धर्मपुत्र का सांप्रदायिक सौहार्द या हमराज में समय की नश्वरता का चित्रण—साहिर ने हर बार समाज की नब्ज को पकड़ा। साहिर की सोच का सार उनके इस प्रेरक शेर में झलकता है, रंग और नस्ल, ज़ात और मज़हब, जो भी है आदमी से कमतर है, इस हकीकत को तुम भी मेरी तरह मान जाओ तो कोई बात बने। निश्चित ही, साहिर लुधियानवी क साहित्यिक योगदान पर समय का दाग नहीं लग सकता। उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रभावशाली हैं, जितनी दशकों पहले थीं।
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