गोहाना में संथारा लेकर पूज्य श्री प्रकाशचंद जी महाराज का देवलोकगमन – बड़ौत जैन समाज में शोक की लहर

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
गुरुदेव का जन्म 1 जनवरी 1929 को हुआ था और मात्र 16 वर्ष की आयु में 18 जनवरी 1945 को उन्होंने संयम जीवन को अपनाते हुए दीक्षा ली थी। वे स्वतंत्रता से पूर्व दीक्षित होने वाले जैन समाज के संभवतः एकमात्र संत थे, जिनका संयमी जीवन आज तक समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहा। उनका जीवन तप, त्याग, मौन साधना और आत्मनिष्ठा का आदर्श उदाहरण था।
गुरुदेव की देवलोक यात्रा की सूचना मिलते ही समूचे जैन समाज में शोक की लहर दौड़ गई। बड़ौत स्थित श्री श्वेतांबर स्थानकवासी जैन स्वाध्याय संघ द्वारा श्रद्धांजलि सभा संघ के वरिष्ठ सदस्य श्री कमल जैन के निवास पर आयोजित की गई, जिसमें दर्जनों श्रद्धालु उपस्थित हुए। सभा में कमल जैन ने कहा कि महाराज श्री का संयमी जीवन और उनकी मौन साधना आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा का अमूल्य स्रोत हैं।
सभा में रवि प्रकाश, मुकेश जैन, डॉ. पारस जैन, श्रीपाल जैन, वकील चंद, जिनेन्द्र जैन समेत अनेक श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के चरणों में भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके जीवन से प्रेरणा लेने का संकल्प लिया। सभी श्रद्धालुओं ने एक स्वर में कहा कि गुरुदेव का जाना समाज की ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं।
संयम, साधना और समर्पण की प्रतिमूर्ति अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी शिक्षाएं, तप, त्याग और आत्मानुशासन की अमिट छाप सदैव समाज के मार्गदर्शक के रूप में जीवित रहेंगी।



