कांधला की रामलीला कमेटी के मामले में हाईकोर्ट सख्त
1973 की मूल पत्रावली गायब होने पर मांगा जवाब
जांच की स्थिति पर शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश, मूल फाइल नहीं मिलने पर पुनर्निर्माण कराकर कोर्ट में करनी होगी पेश
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
कांधला। कस्बे की ऐतिहासिक श्री रामलीला कमेटी से जुड़े विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप किया है। मंगलवार, 3 नवंबर को रिट याचिका संख्या 44628/2026 पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने वर्ष 1973 की मूल पंजीकरण पत्रावली गायब होने और मामले की जांच को लेकर संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया है।
याचिकाकर्ता श्री रामलीला कमेटी कांधला (अपंजीकृत—कैलाशचंद्र गुट) की ओर से प्रबंधक एवं अधिकृत प्रतिनिधि आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज स्वयं न्यायालय में उपस्थित हुए और पक्ष रखा।
न्यायालय ने राज्य सरकार के स्थायी अधिवक्ता को शपथपत्र दाखिल कर 25 अगस्त 2025 के पत्र के आधार पर गठित जांच की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही वर्ष 1973 की मूल पंजीकरण पत्रावली अब तक नहीं मिलने की स्थिति में उसे तलाशने के लिए की गई कार्रवाई का विवरण भी मांगा है।
हाईकोर्ट ने सहायक रजिस्ट्रार को निर्देशित किया है कि संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर देने के बाद यदि मूल पत्रावली उपलब्ध नहीं होती है तो उसका पुनर्निर्माण कराया जाए और अगली सुनवाई से पहले न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए।
इसके अतिरिक्त प्रतिवादी संख्या 4, 5, 6 और 7 को नोटिस जारी करने का आदेश दिया गया है। वहीं प्रतिवादी संख्या 3 द्वारा निर्धारित समय तक शपथपत्र दाखिल नहीं किए जाने पर उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
7 दिसंबर को होगी अगली सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई 7 दिसंबर 2026 को निर्धारित की गई है। याचिका को शीर्ष दस मामलों में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।
मूल अभिलेखों को लेकर बढ़ी कानूनी हलचल
हाईकोर्ट के इन निर्देशों के बाद वर्ष 1973 की मूल पंजीकरण पत्रावली, वर्ष 2008 में दूसरी संस्था के पंजीकरण तथा संबंधित अधिकारियों की भूमिका से जुड़े सवाल न्यायिक विचार के दायरे में आ गए हैं। अब संबंधित अधिकारियों को जांच और अभिलेखों की स्थिति न्यायालय के समक्ष स्पष्ट करनी होगी।
आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज का कहना है कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि कांधला की ऐतिहासिक रामलीला परंपरा, मूल अभिलेखों और सार्वजनिक संपत्ति से जुड़े अधिकारों की रक्षा के लिए है। उनका कहना है कि मूल पत्रावली का सच सामने आना जरूरी है। उन्होंने न्यायालय पर पूर्ण विश्वास जताते हुए कहा कि सत्य की लड़ाई जारी रहेगी।


