बागपत

ऑपरेशन शहादत: इस्लाम के नाम पर सबसे बड़ा धोखा

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो

बागपत। 10 नवंबर की शाम लाल किले के पास हुआ आतंकवादी हमला पूरे देश के दिल-दिमाग को झकझोर गया। 14 बेगुनाहों की मौत, कई परिवारों का उजड़ना और दर्जनों घायलों की चीखें—यह सब देखकर मन सवालों से भर गया। अगर हमारी पुलिस और एजेंसियाँ समय पर कार्रवाई न करतीं, तो शायद यह साजिश और भी बड़ा रूप ले लेती।

लेकिन कल जब मुख्य आरोपी डॉ. उमर नबी का वीडियो सामने आया, जिसमें वह फिदायीन हमलों को “ऑपरेशन शहादत” कहकर उनका महिमामंडन कर रहा था, तो सच्चाई साफ हो गई—आतंकी संगठन अपनी कायरता और अपराधों को इस्लामी शब्दों में छिपाकर पेश करते हैं।

इस्लाम की शिक्षाओं के उलट आतंकवादियों की सोच

आतंकी ग्रुप अपने निजी एजेंडे को पूरा करने के लिए इस्लाम का नाम इस्तेमाल करते हैं, जबकि इस्लाम की नींव दया, अमन और इंसानियत पर रखी गई है।
सच्चाई यह है कि इन आतंकी वारदातों से न मुसलमानों को फायदा हुआ, न इस्लाम की छवि बेहतर हुई—बल्कि दुनिया भर में नुकसान ही हुआ।

सबसे दर्दनाक बात यह है कि ये संगठन उन मासूम युवाओं को निशाना बनाते हैं जो इस्लामी शिक्षाओं से अनजान होते हैं। वे न गैर-मुस्लिम देशों को छोड़ते हैं, न मुस्लिम देशों को; न मस्जिदों को, न कब्रिस्तानों को; न औरतों-बच्चों को, न बुज़ुर्गों को।

डॉ. उमर: पढ़ाई में सफल, सोच में बरबाद

गरीबी में पले-बढ़े डॉ. उमर से उसके परिवार को उम्मीद थी कि वह उन्हें सहारा देगा।
लेकिन आतंकियों ने उसके जैसे युवाओं का ब्रेनवॉश कर, इस्लामी शब्दों का गलत अर्थ समझाकर उन्हें मौत का औजार बना दिया।
उमर ने न सिर्फ़ कई बेगुनाहों की जान ली, बल्कि अपने लिए जहन्नुम का टिकट और अपने परिवार के लिए बरबादी लिख दी।

आतंकवाद का जन्मदाता: इस्लाम नहीं, ओसामा की जहरीली सोच

“ऑपरेशन शहादत” या आत्मघाती हमले इस्लाम की देन नहीं—यह सोच ओसामा बिन लादेन ने पैदा की।
पैगंबर मुहम्मद ﷺ, चारों खलीफाओं, उमय्यद, अब्बासी, फातिमी और ओटोमन जैसी तमाम इस्लामी सल्तनतों में कभी आत्मघाती हमले की कोई मिसाल नहीं मिलती।

खुद ओसामा ने कभी फिदायीन हमला नहीं किया—मरते हमेशा मासूम युवा हैं, बचते हमेशा आका।

कुरान आतंकवादियों की सोच को गलत साबित करता है

कुछ आयतों को गलत अर्थ में पेश कर मासूमों की हत्या को “जिहाद” बताया जाता है।
लेकिन कुरान साफ कहता है:

“जो निर्दोष को मारे, मानो सारी इंसानियत को मारा।” (5:32)

“खुद को मत मारो, अल्लाह रहम करने वाला है।” (4:29)

“धरती में फसाद मत फैलाओ।” (7:56)

सच्चाई यही है—सुसाइड अटैक और बेगुनाहों की हत्या पूरी तरह गैर-इस्लामी है।

इस्लाम वह धर्म है जो जान बचाने पर जन्नत देता है—जान लेने पर नहीं।
जो धर्म दूसरों के देवी-देवताओं को बुरा कहने तक से रोकता है—वह बेगुनाहों को मारने की इजाज़त कैसे दे सकता है?

आतंकवादी चाहे कितनी भी कोशिश कर लें,
इस्लाम का आतंकवाद से कोई संबंध नहीं—
पर आतंकवाद का इस्लाम को बदनाम करने से ज़रूर संबंध है।

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