
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
असम के लोकप्रिय गायक जुबिन गर्ग की रहस्यमयी मौत के बाद राज्यभर में न्याय की माँग को लेकर जनआक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। जुबिन गर्ग के लिए बीते 63 दिनों से हर वर्ग के लोग—छात्र, युवा, कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता और आम लोग—सोशल मीडिया पर #JusticeForZubeenGarg हैशटैग के ज़रिए सक्रिय रूप से बड़े पैमाने पर हिस्सा ले रहे हैं। सोशल मीडिया के साथ-साथ असम की कई सड़कों पर भी कैंडल मार्च, अनशन, और विरोध रैलियाँ आयोजित की जा रही हैं, जहां भारी भीड़ देखी जा रही है। सरकार ने जनता के आक्रोश और आंदोलन को देखते हुए जुबिन गर्ग की मौत के मामले की जांच के लिए सीआईडी की एसआईटी के अलावा न्यायिक आयोग का गठन किया था । जिस आयोग की अध्यक्षता गुवाहाटी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सैकिया कर रहे हैं। जांच के तहत जुबिन गर्ग के बैंड के कई सदस्यों, मैनेजर और आयोजन समिति के प्रमुख से भी घंटों पूछताछ की गई है। इसमें कई महत्वपूर्ण गिरफ्तारियां भी हुई हैं—असल में सीआईडी ने हत्या, आपराधिक षड्यंत्र और लापरवाही से मौत पहुंचाने की धाराओं में केस दर्ज किया है। सिंगापुर से फॉरेन्सिक और मेडिकल रिकॉर्ड के आधार पर जाँच आगे बढ़ाई जा रही है, लेकिन जनता को अब तक पारदर्शी और संतोषजनक जवाब नहीं मिला है। विशेष तौर पर जुबिन गर्ग की पत्नी गरिमा गर्ग और परिवार के अन्य सदस्य लगातार लोगों से शांति और एकजुटता बनाए रखने की अपील कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें राजनीति से ऊपर सच्चाई और न्याय चाहिए, और यही वजह है कि आंदोलन में स्थानीय संस्कृति, समाज और विभिन्न संगठनों की बड़ी भागीदारी देखी जा रही है। आन्दोलन राज्य के लगभग सभी जिलों और छोटे गांवों तक फैल चुका है। कुछ स्थानों पर पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच टकराव की स्थिति भी बनी थी । विरोध के स्वर इतने मजबूत हैं कि असम सरकार पर शीघ्र और निष्पक्ष जांच का दबाव बेहद बढ़ गया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने ऐलान किया है कि 8 दिसंबर को SIT अपनी चार्जशीट दाखिल करेगी और इसके बाद जनता के सामने पूरी सच्चाई लाई जाएगी। सरकार ने सिंगापुर की अथॉरिटीज से भी सहयोग मांगा था तथा जांच को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से लिया जा रहा है। जुबिन गर्ग की मौत अब सिर्फ एक क्राइम केस नहीं, बल्कि राज्य की न्याय प्रणाली और सांस्कृतिक चेतना की भी परीक्षा बन गई है। असम की जनता—खासतौर से युवाओं और सांस्कृतिक संस्थाओं—की निगाहें सरकार और न्याय प्रणाली के हर कदम पर बनी हुई हैं। गरिमा गर्ग ने दोहराया है कि उन्हें केवल न्याय चाहिए, राजनीति या ढोल-तमाशा नहीं चाहिए।


