धरोहर ने किया सैया भये कोतवाल का मंचन।
सैया भये कोतवाल नाटक में में दिखाया गया प्रशासन में भाई भतीजाबाद।

दर्शन हुए लोटपोट, खूब बजी तालियां, किया गया सैया भये कोतवाल नाटक का मंचन।
नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
बोकारो। “सैयां भये कोतवाल” अर्थात जब अपना कोई करीबी या रिश्तेदार ऊंचे पद और शक्ति पा ले, तो बेफिक्र होकर मनमानी करना और किसी का डर न रहना। यह कहावत शक्तिशाली सहारे के भरोसे सुरक्षा और अहंकार को दर्शाती है। यह एक प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य नाटक है।जो भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और मूर्खतापूर्ण शासन पर करारा प्रहार करता है। कहानी एक मूर्ख राजा, चालाक कोतवाल और भ्रष्ट दरबारियों के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ “सैयां भये कोतवाल…” कहावत के सहारे शक्ति के दुरुपयोग को दिखाया गया है।यह नाटक अक्सर अपनी कॉमेडी और सामाजिक संदेश के लिए रंगमंच पर लोकप्रिय रहा है।भाई-भतीजावाद जैसी नीति अपनाकर कोई भी लंबे समय तक अपने पांव नहीं जमा सकता। व्यवस्था में भ्रष्टाचार के जरिये पांव जमाने वाले लोग जब फंसते हैं तो कोई भी उनका सहारा नहीं बनता।
नाटक सैंया भए कोतवाल ने की व्यवस्था पर चोट। भाई-भतीजावाद जैसी नीति अपनाकर कोई भी लंबे समय तक अपने पांव नहीं जमा सकता। व्यवस्था में भ्रष्टाचार के जरिये पांव जमाने वाले लोग जब फंसते हैं तो कोई सहारा नहीं बनता। हास्य-व्यंग्य से भरपूर नाटक सैंया भए कोतवाल में व्यवस्था पर चोट करते हुए कलाकारों ने भ्रष्टाचार की पोल खोलने का कार्य किया। तमाशा शैली में मंचित नाटक में सूर्यपुर नगर की कहानी को दिखाया गया। मूर्ख राजा रणधीरा के कोतवाल के मरने के बाद सभी को नए कोतवाल की चिंता लग जाती है। जिसका फायदा प्रधान उठाता है और अपने बेवकूफ साले को कोतवाल बना देता है। राज्य का हवलदार और सिपाही नए कोतवाल को देखकर खुश नहीं होते और उसे फंसाने की तरकीब सोचने लगते हैं। कोतवाल से बात करने पर हवलदार को पता चलता है कि उसे गाना सुनने का शौक है। ऐसे में हवलदार अपनी प्रेमिका मैनावती के साथ मिलकर कोतवाल को फसाने की चाल चलता है और कोतवाल के आगे मैनावती के प्यार का झांसा डाल देता है। मैनावती कोतवाल से शादी करने की शर्त पर राजा का छपरी पलंग मांग लेती है। कोतवाल हवलदार और सिपाही से छपरी पलंग मंगवा लेता है। वहीं हवलदार राजा को भी इस चोरी की खबर दे देता है। छपरी पलंग आने के बाद कोतवाल जब मैनावती से शादी करने पहुंचता है तो राजा का पंडित का वेश धरकर शादी करवाने पहुंच जाता हैं, जहां दोनों की शादी हो जाती है, लेकिन बाद में नाटक से जब पर्दा उठता है तो पता चलता है कि दुल्हन मैनावती नहीं बल्कि मैनावती का शागिर्द है। अंत में राजा हवलदार से खुश होकर उसे कोतवाल बना देता है। नाटक में कलाकारों का अभिनय, संगीत, वेशभूषा और संवाद सभी को रोमांचित करने में अपनी अहम भूमिका निभा रहे थे। नाटक में कोतवाल की भूमिका में रंगकर्मी प्रदीप कुमार, हवलदार की भूमिका में रंगकर्मी मनोज कुमार दास, सिपाही की भूमिका में राहुल कुमार, राजा की भूमिका में सोनू सिंह, पैंद्या और प्रधान की भूमिका में संतोष कुमार, मीनावती के भूमिका में लक्ष्मी कुमारी दास, सख्या की भूमिका में सुमित कुमार, मासी की भूमिका में श्याम कृष्ण खत्री, किशन की भूमिका में कृष्ण कुमार ने अपनी कलाकारी से सभी को लोटपोट कर दिया। गोपियों की भूमिका में रिंकी, नेहा, अर्चना अंजलि ने बेहतरीन कार्य की।
नेपथ्य से
मंच संचालन वर्षा अग्रहरि, प्रस्तुति प्रभार लक्ष्मी देवी एवं लक्ष्मी कुमारी, मंच प्रभार एवं समन्वयक नीतू कुमारी, नृत्य निदेशक लक्ष्मी कुमारी दास, रूप सजा एवं मंच सज्जा मृत्युंजय भौमिक, वस्त्र सजा विक्रांत पासवान, प्रचार प्रसार मनोज कुमार दास, ध्वनि शैलेंद्र कुमार, सहायक निदेशक प्रदीप एवं संतोष, आयोजन सहायक संजीव श्रीवास्तव, रूपेंद्र नारायण सिंह, विनोद सिंह, अरुण कुमार, रामकुमार महाराज, अमित कुमार, महेंद्र सिंहा, प्रदीप दत्ता, सुशील गुप्ता, प्रशांत कुमार, प्रमोद शर्मा पिंटू, जयशंकर प्रसाद, सुबोध मोदी एवं बसंत कुमार ।




