बेतुल
बैतूल सरकारी अमला और खोखलापन हर्षाअग्रवाल

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बैतूल : सरकारी कर्मचारी जनता के सेवक होते हैं। स्कूल की पाठ्यपुस्तकों से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम तक हर जगह यही शिक्षा दी जाती है कि शासन-प्रशासन का उद्देश्य समाज की सेवा करना है। कहीं भी यह नहीं सिखाया जाता कि पद का दुरुपयोग कैसे किया जाए, भ्रष्टाचार कैसे किया जाए या ईमानदारी को त्यागकर स्वार्थ को कैसे प्राथमिकता दी जाए।
फिर भी यह प्रश्न मन को विचलित करता है कि आखिर क्यों कुछ लोग सरकारी पद प्राप्त करने के बाद अपने मूल कर्तव्य से भटक जाते हैं? क्यों जनता की सेवा का संकल्प धीरे-धीरे अधिकार, अहंकार और स्वार्थ के बोझ तले दब जाता है? जब कोई गरीब, असहाय या सामान्य नागरिक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते-लगाते थक जाता है और उसे अपेक्षित सम्मान व सहायता नहीं मिलती, तब उसके मन में पूरे सरकारी तंत्र के प्रति अविश्वास जन्म लेने लगता है।
यह अविश्वास केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। यह परिवार, समाज, गांव और अंततः पूरे राष्ट्र की सोच को प्रभावित करता है। जब जनता को यह महसूस होने लगे कि व्यवस्था उनके लिए नहीं, कुछ लोगों के निजी हितों के लिए चल रही है, तब लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं। भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं है; यह मानवता, नैतिकता और सामाजिक विश्वास पर किया गया आघात है।हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकारी पद किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, जनता द्वारा सौंपा गया दायित्व है। एक ईमानदार कर्मचारी हजारों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है, वहीं एक भ्रष्ट अधिकारी पूरे विभाग की छवि धूमिल कर सकता है। इसलिए आवश्यक है कि प्रशासनिक तंत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।आज समय की मांग है कि सरकारी सेवा को नौकरी नहीं, राष्ट्रसेवा के रूप में देखा जाए। यदि प्रत्येक कर्मचारी अपने दायित्व को ईमानदारी से निभाए, तो जनता का विश्वास लौटेगा, देश की विकास यात्रा भी अधिक मजबूत और सार्थक होगी। आखिरकार, किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों और उनकी व्यवस्था पर विश्वास में ही निहित होती है।


