लोनी में बंजर सरकारी भूमि की कथित बिक्री पर उठे गंभीर सवाल
लगातार शिकायत दर्ज कराने के बावजूद कार्यवाही नहीं होने से स्थानीय निवासीयों में रोष ।

लोनी (गाजियाबाद)। नगर पालिका परिषद लोनी के वार्ड संख्या-35 के सभासद गुलजार अल्वी द्वारा ग्राम धरोटी खुर्द की बंजर सरकारी भूमि को लेकर लगातार शिकायतें किए जाने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से राजस्व एवं नगर पालिका प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक हैं। इस मामले में भूमाफियाओं के साथ-साथ संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका व सांठगांठ को लेकर भी अब चर्चाएं तेज हो गई हैं।
अधिशासी अधिकारी ने दिए थे स्पष्ट निर्देश
सभासद गुलजार अल्वी के अनुसार, नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी ने इस प्रकरण को गंभीर मानते हुए लेखपाल किरणपाल गौतम एवं नगर पालिका परिषद की अवर अभियंता श्रीमती नीलम को निर्देश दिए थे कि विवादित भूमि पर किसी भी प्रकार का क्रय-विक्रय न किए जाने संबंधी सूचना बोर्ड तत्काल लगवाना सुनिश्चित किया जाए, ताकि आम लोगों को भूमि की वास्तविक स्थिति की जानकारी मिल सके और किसी प्रकार का अवैध लेन-देन न हो।
लेकिन आरोप है कि इन निर्देशों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। न तो मौके पर कोई चेतावनी बोर्ड लगाया गया और न ही भूमि की स्थिति को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया। स्थानीय स्तर पर इसे महज लापरवाही नहीं, बल्कि प्रकरण में शामिल लोगों को अप्रत्यक्ष सहयोग के रूप में भी देखा जा रहा है।
समय पर कार्रवाई होती तो बच सकती थी सरकारी जमीन
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि तहसीलदार द्वारा अधिशासी अधिकारी के पत्र की जांच समय रहते पूरी कर ली जाती और भूमि पर सरकारी सूचना बोर्ड लगा दिया जाता, तो ग्राम समाज की बंजर भूमि के कथित क्रय-विक्रय को रोका जा सकता था। सभासद गुलजार अल्वी लगातार अधिकारियों को शिकायतें और पत्र भेजते रहे, लेकिन इसके बावजूद न तो प्रभावी जांच हुई और न ही कब्जा या बिक्री रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाया गया।
कागजी कार्रवाई तक सीमित रहा प्रशासन?
इस मामले में यह सवाल भी उठ रहा है कि जब नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी द्वारा तहसील प्रशासन को पत्र भेजा गया, जिलाधिकारी को अवगत कराया गया और सम्पूर्ण समाधान दिवस में भी मामला उठाया गया, तो फिर कार्रवाई आखिर क्यों नहीं हुई? क्या पूरा मामला केवल पत्राचार और कागजी खानापूर्ति तक सीमित रहा?
सरकार और न्यायालय के सख्त रुख के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं?
प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समय-समय पर सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा करने वालों और भूमाफियाओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई के निर्देश देते रहे हैं। वहीं उच्च न्यायालय भी सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा और अवैध कब्जों के मामलों में सख्त रुख अपनाता रहा है। इसके बावजूद यदि शिकायतों के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
बंजर सरकारी भूमि की कथित बिक्री की शिकायत के वावजूद कार्रवाई न होने से अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में
इसके लिए कौन हैं जिम्मेदार?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
भूमि पर चेतावनी बोर्ड लगाने के आदेशों का पालन किसके स्तर पर रोका गया? जांच प्रक्रिया में देरी क्यों की गई?
क्या भूमाफियाओं को किसी सरकारी तंत्र का संरक्षण प्राप्त था?
इस पूरे प्रकरण में कौन-कौन अधिकारी और कर्मचारी जिम्मेदार हैं?
यदि लापरवाही या मिलीभगत साबित होती है तो दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी?
इन सवालों के जवाब अभी तक सामने नहीं आए हैं। हालांकि मामले ने प्रशासनिक पारदर्शिता और सरकारी भूमि की सुरक्षा को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।
निष्पक्ष जांच व दोषियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग तेज
सभासद गुलजार अल्वी सहित स्थानीय लोगों ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराने, भूमाफियाओं के साथ-साथ लापरवाही या मिलीभगत के दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करने तथा सरकारी भूमि को तत्काल कब्जा मुक्त कराने की मांग की है।
फिलहाल यह मामला कई अनुत्तरित सवालों के साथ प्रशासन और राजस्व विभाग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।




