बागपत

“कैंसर से लड़ाई सिर्फ दवाइयों से नहीं, विश्वास, साहस और समय पर इलाज से जीती जाती है”

डॉ. तरुण तोमर
MBBS, MD (Internal Medicine), DM (Medical Oncology)
कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट एवं कैंसर विशेषज्ञ
मेडिसिटी हॉस्पिटल, कोताना रोड,
बड़ौत, बागपत
प्रश्न: डॉक्टर साहब, सबसे पहले अपने बारे में और मेडिकल क्षेत्र में आने की प्रेरणा के बारे में बताइए।
डॉ. तरुण तोमर:
मैं एक ऐसे परिवार और वातावरण से आता हूं, जहां सेवा और इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म माना जाता था। बचपन से ही लोगों का दर्द देखकर मन में यह भावना थी कि जीवन ऐसा होना चाहिए, जिससे किसी के चेहरे पर मुस्कान लौट सके। इसी सोच ने मुझे डॉक्टर बनने की प्रेरणा दी। मेडिकल की पढ़ाई के दौरान जब कैंसर मरीजों की पीड़ा को करीब से देखा, तब महसूस हुआ कि इस क्षेत्र में विशेषज्ञ डॉक्टरों की बहुत आवश्यकता है। मरीज सिर्फ दवा नहीं चाहता, वह उम्मीद चाहता है, भरोसा चाहता है। तभी मैंने मेडिकल ऑन्कोलॉजी को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।
प्रश्न: कैंसर शब्द सुनते ही लोग घबरा जाते हैं। क्या वास्तव में स्थिति इतनी भयावह होती है?
डॉ. तरुण तोमर:
सबसे पहले मैं यही कहना चाहूंगा कि कैंसर का मतलब जीवन का अंत नहीं है। पहले के समय में लोगों के पास जानकारी कम थी और इलाज के विकल्प भी सीमित थे। लेकिन आज चिकित्सा विज्ञान ने बहुत प्रगति की है। यदि समय रहते बीमारी का पता चल जाए और सही इलाज शुरू हो जाए तो अनेक प्रकार के कैंसर पूरी तरह ठीक हो सकते हैं। इसलिए डरने की नहीं, जागरूक होने की जरूरत है।
प्रश्न: जब कोई मरीज पहली बार आपके पास आता है और उसे पता चलता है कि उसे कैंसर है, तब आप उससे क्या कहते हैं?
डॉ. तरुण तोमर:
मैं सबसे पहले उसकी आंखों में देखता हूं और कहता हूं—”डरिए मत, हम मिलकर इस बीमारी से लड़ेंगे।”
कई मरीज रिपोर्ट देखकर ही मानसिक रूप से टूट जाते हैं। ऐसे समय में डॉक्टर की भूमिका केवल इलाज करने की नहीं होती, बल्कि मरीज के मनोबल को मजबूत करने की भी होती है। मेरा प्रयास रहता है कि मरीज और उसके परिवार को बीमारी की पूरी जानकारी दूं और उन्हें भरोसा दिलाऊं कि हर संभव प्रयास किया जाएगा।
प्रश्न: क्या आपने ऐसे मरीज भी देखे हैं जिन्होंने आपको भावुक कर दिया हो?
डॉ. तरुण तोमर:
ऐसे अनगिनत मरीज हैं। एक बार एक छोटी बच्ची अपने पिता के साथ आई थी। उसके पिता कैंसर से जूझ रहे थे। बच्ची ने मेरा हाथ पकड़कर पूछा, “डॉक्टर अंकल, मेरे पापा मेरे स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम में आएंगे ना?” उस मासूम सवाल ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। उस दिन मैंने महसूस किया कि हम केवल एक मरीज का इलाज नहीं कर रहे होते, बल्कि पूरे परिवार के सपनों की रक्षा कर रहे होते हैं।
प्रश्न: एक डॉक्टर के रूप में सबसे कठिन क्षण कौन-सा होता है?
डॉ. तरुण तोमर:
जब बीमारी बहुत अधिक बढ़ चुकी हो और चिकित्सा विज्ञान की सीमाएं सामने आ जाएं। उस समय मरीज और उसके परिवार को संभालना बहुत कठिन होता है। लेकिन हम अंतिम क्षण तक प्रयास करना नहीं छोड़ते। कई बार दवा से ज्यादा जरूरी मरीज को यह एहसास दिलाना होता है कि वह अकेला नहीं है।
प्रश्न: क्या आजकल युवाओं में भी कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं?
डॉ. तरुण तोमर:
दुर्भाग्य से हां। पहले कैंसर को बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब कम उम्र के लोगों में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण बदलती जीवनशैली, तंबाकू और धूम्रपान का सेवन, जंक फूड, प्रदूषण, तनाव और शारीरिक गतिविधियों की कमी है। इसलिए युवाओं को अपने स्वास्थ्य के प्रति पहले से अधिक सजग रहने की जरूरत है।
प्रश्न: ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अक्सर झाड़-फूंक और घरेलू उपचार में समय गंवा देते हैं। आप क्या कहना चाहेंगे?
डॉ. तरुण तोमर:
यही सबसे बड़ी समस्या है। कैंसर जितनी जल्दी पकड़ा जाता है, इलाज उतना ही बेहतर होता है। कई मरीज पहले झाड़-फूंक, अप्रमाणित उपचार या गलत सलाह में महीनों निकाल देते हैं और जब अस्पताल पहुंचते हैं तब तक बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। मेरी सभी लोगों से अपील है कि किसी भी संदिग्ध लक्षण को नजरअंदाज न करें और योग्य विशेषज्ञ से तुरंत सलाह लें।
प्रश्न: कैंसर से बचाव के लिए लोग क्या करें?
डॉ. तरुण तोमर:
तंबाकू और धूम्रपान से पूरी तरह दूरी बनाएं। शराब का सेवन न करें या सीमित रखें। पौष्टिक भोजन करें, नियमित व्यायाम करें, पर्याप्त नींद लें और तनाव को नियंत्रित रखें। समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराएं। महिलाओं को स्तन और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की जांच तथा पुरुषों को भी उम्र और जोखिम के अनुसार नियमित जांच करानी चाहिए।
प्रश्न: इलाज के दौरान परिवार की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है?
डॉ. तरुण तोमर:
कई बार दवाइयों से ज्यादा असर परिवार के प्यार और सहयोग का होता है। यदि परिवार मरीज का मनोबल बनाए रखे, उसे अकेला महसूस न होने दे और डॉक्टर की सलाह का पूरी तरह पालन करे, तो इलाज के परिणाम बेहतर होते हैं। सकारात्मक वातावरण मरीज को मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।
प्रश्न: आपके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार क्या है?
डॉ. तरुण तोमर:
जब कोई मरीज इलाज के बाद स्वस्थ होकर अपने परिवार के साथ मुस्कुराते हुए मेरे पास आता है, मिठाई खिलाता है और कहता है—”डॉक्टर साहब, आपने मुझे नया जीवन दिया”—तो वही मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है। कोई भी पदक या पुरस्कार उस खुशी की बराबरी नहीं कर सकता।
प्रश्न: क्या डॉक्टर भी भावुक होते हैं?
डॉ. तरुण तोमर:
बिल्कुल। डॉक्टर भी इंसान होते हैं। हम भी मरीजों के दर्द को महसूस करते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि हमें अपने भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए सही निर्णय लेना होता है। कई बार किसी मरीज की मौत के बाद पूरी टीम घंटों तक उदास रहती है। वहीं किसी मरीज के ठीक होकर घर लौटने पर पूरे वार्ड में खुशी का माहौल बन जाता है।
प्रश्न: बड़ौत और आसपास के लोगों के लिए आपका संदेश?
डॉ. तरुण तोमर:
मैं सभी से कहना चाहता हूं कि कैंसर से डरिए मत, लेकिन इसे हल्के में भी मत लीजिए। शरीर में कोई भी असामान्य बदलाव दिखाई दे तो तुरंत जांच कराइए। समय पर इलाज, सही डॉक्टर और सकारात्मक सोच—ये तीन बातें मिलकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी पर भी विजय दिला सकती हैं।
सुरेंद्र मलानिया का वक्तव्य
“डॉ. तरुण तोमर से बातचीत केवल एक डॉक्टर का इंटरव्यू नहीं थी, बल्कि यह जीवन, संघर्ष, उम्मीद और इंसानियत की कहानी थी। उनकी बातों में चिकित्सा विज्ञान का ज्ञान तो है ही, साथ ही मरीजों के प्रति गहरी संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण भी स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने यह साबित किया कि एक सच्चा डॉक्टर केवल दवा नहीं देता, बल्कि टूटते हुए परिवारों को विश्वास देता है, निराश आंखों में उम्मीद जगाता है और जिंदगी से हार चुके लोगों को फिर से जीने का साहस देता है। बड़ौत जैसे क्षेत्र में उनकी सेवाएं निश्चित रूप से कैंसर मरीजों के लिए एक नई उम्मीद हैं।”
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