बागपत
शिक्षा उत्थान के प्रणेता चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा
जाट कॉलेज से जनता वैदिक तक विकास यात्रा के साक्षी

1990 में संभाली संस्था की कमान
खाते में थे मात्र 2 रुपये 89 पैसे; विपक्ष के 56 मुकदमों में उलझने से विकास की रफ्तार प्रभावित होने का दावा
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बड़ौत (बागपत) : शिक्षा किसी भी समाज के विकास की सबसे मजबूत आधारशिला होती है। जब शिक्षा के साथ दूरदृष्टि, अनुशासन, बेहतर प्रबंधन और सामाजिक सरोकार जुड़ते हैं तो शिक्षण संस्थान केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं रहते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य निर्माण का माध्यम बन जाते हैं। बड़ौत की ऐतिहासिक शैक्षिक परंपरा से जुड़ी जाट शिक्षा सभा एवं जनता वैदिक शिक्षण संस्थाओं की विकास यात्रा भी इसी सोच का उदाहरण है।
इस लंबी यात्रा के महत्वपूर्ण साक्षी रहे हैं चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा, जिन्होंने वर्ष 1990 में संस्था की जिम्मेदारी संभाली। उस समय संस्था की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी और खाते में मात्र 2 रुपये 89 पैसे थे। इसके बाद संस्था को आर्थिक रूप से मजबूत करने, शिक्षण संस्थाओं का विस्तार करने, भवन निर्माण कराने और खेल सुविधाएं विकसित करने की दिशा में लगातार प्रयास किए गए।
बातचीत में चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा ने संस्था की विकास यात्रा के साथ-साथ उन परिस्थितियों का भी उल्लेख किया, जिनके कारण उनके अनुसार संस्था का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो सका।
1985 का चुनाव घोल्लूघारा के चलते नहीं हो सका संपन्न
चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा ने अपनी चुनावी यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि संस्था के अध्यक्ष पद को लेकर चुनावी प्रक्रिया के दौरान कई महत्वपूर्ण परिस्थितियां सामने आईं। सन 1985 में होने वाला चुनाव घोल्लूघारा के चलते संपन्न नहीं हो सका। इसके बाद संस्था की व्यवस्थाओं और नेतृत्व को लेकर लंबे समय तक परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण बनी रहीं।
वर्ष 1990 में हुए चुनाव में उन्हें 238 मतों से जीत मिली और 17 जून 1990 को उन्होंने संस्था की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद उन्होंने संस्था के विकास को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास शुरू किए।
2 रुपये 89 पैसे से आर्थिक मजबूती तक का सफर
जब चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा ने वर्ष 1990 में संस्था की जिम्मेदारी संभाली, तब संस्था के खाते में मात्र 2 रुपये 89 पैसे थे। सीमित आर्थिक संसाधनों के बीच संस्था को आत्मनिर्भर बनाना सबसे बड़ी चुनौती थी।
उन्होंने बताया कि संस्था की स्थायी आय के स्रोत विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया गया। इसी दिशा में करीब 400 दुकानों का निर्माण कराया गया। दुकानों से मिलने वाली आय ने संस्था की आर्थिक स्थिति को मजबूत आधार दिया और आगे के विकास कार्यों के लिए संसाधन उपलब्ध हुए।
विपक्ष के 56 मुकदमों का भी किया उल्लेख
चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा ने बातचीत के दौरान संस्था के विकास में सामने आई कानूनी अड़चनों का भी उल्लेख किया। उनका कहना है कि विपक्षियों द्वारा उन्हें 56 मुकदमों में उलझाया गया, जिसके कारण संस्था के विकास कार्य प्रभावित हुए।
उनके अनुसार, इन कानूनी विवादों और मुकदमों में समय और संसाधन लगने के कारण संस्था का विकास उस गति से नहीं हो पाया, जिस गति से वह होना चाहिए था।
उन्होंने इसे संस्था के विकास की बड़ी बाधा बताते हुए कहा कि यदि ये परिस्थितियां सामने नहीं आतीं तो संस्था आज की स्थिति से कहीं अधिक विकसित होती। उनके अनुसार, इन विवादों के चलते संस्था विकास की दौड़ में लगभग 50 वर्ष पीछे रह गई।
हालांकि 56 मुकदमों और उनसे जुड़े आरोपों के संबंध में संबंधित न्यायालयों के रिकॉर्ड और दूसरे पक्ष का पक्ष अलग से महत्वपूर्ण होगा। यह बात चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा द्वारा साक्षात्कार में व्यक्त किए गए दावे के रूप में सामने आई है।
जाट कॉलेज से जनता वैदिक तक का सफर
बड़ौत की शैक्षिक परंपरा में जाट कॉलेज का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। समय के साथ संस्था ने विस्तार करते हुए जनता वैदिक इंटर कॉलेज, डिग्री कॉलेज, तकनीकी शिक्षा और अन्य शैक्षिक व्यवस्थाओं का व्यापक स्वरूप विकसित किया।
चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा के अनुसार, संस्था की सोच हमेशा शिक्षा को समाज और राष्ट्र निर्माण से जोड़ने की रही। इसी सोच के तहत प्राथमिक शिक्षा से लेकर इंटरमीडिएट, उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा तक विभिन्न व्यवस्थाओं का विस्तार किया गया।
तकनीकी शिक्षा के लिए आईटीआई का विकास
क्षेत्र के युवाओं को रोजगारपरक एवं तकनीकी शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जनता वैदिक औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) के विकास पर काम किया गया। इससे ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण और रोजगार के नए अवसर प्राप्त करने का रास्ता खुला।
गरीब परिवारों के बच्चों के लिए मॉडर्न स्कूल
ग्रामीण क्षेत्र के किसानों और मजदूर परिवारों के बच्चों को किफायती दर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जनता वैदिक मॉडर्न स्कूल की स्थापना की गई। इसमें कक्षा 1 से 5 तक शिक्षा की व्यवस्था विकसित की गई।
इसके साथ ही जनता वैदिक इंटर कॉलेज में बदलते समय की जरूरतों के अनुरूप कक्षा 6 से 12 तक अंग्रेजी माध्यम की कक्षाओं का संचालन शुरू कराया गया।
डिग्री कॉलेज में बड़े स्तर पर विकास कार्य
जनता वैदिक डिग्री कॉलेज की प्रबंध समिति के अध्यक्ष के रूप में चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा के अनुसार, महाविद्यालय में आधारभूत सुविधाओं के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया।
कॉलेज परिसर में लगभग 5,000 लोगों की क्षमता वाले मल्टीपर्पज हॉल का निर्माण कराया गया। वहीं कॉलेज के सैकड़ों बीघा कृषि फार्म को सुरक्षित रखने के लिए उसके चारों ओर चारदीवारी का निर्माण कराया गया।
इसके अलावा स्व-वित्तपोषित योजना के तहत विभिन्न नए संस्थागत एवं व्यावसायिक विषयों और पाठ्यक्रमों का संचालन शुरू कराया गया, जिससे स्थानीय ही नहीं बल्कि दूसरे क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए भी उच्च शिक्षा के अवसर बढ़े।
खेल सुविधाओं का भी हुआ विस्तार
शिक्षा के साथ खेलों को विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया। इसी सोच के तहत संस्था में स्टेडियम, मल्टीपर्पज हॉल और रेसलिंग स्टेडियम जैसी सुविधाओं का विकास कराया गया।
उद्देश्य रहा कि विद्यार्थी पढ़ाई के साथ खेलों में भी अपनी प्रतिभा को निखार सकें और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का अवसर प्राप्त करें।
‘विकास की गति और तेज हो सकती थी’
चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा का कहना है कि संस्था के पास जमीन, भवन और अन्य संसाधनों की पर्याप्त संभावनाएं थीं। यदि लंबे समय तक चलने वाले विवाद और मुकदमे सामने नहीं आते तो इन संसाधनों का उपयोग शिक्षा के विस्तार में और अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता था।
उनके अनुसार, 56 मुकदमों के कारण संस्था का समय और ऊर्जा कानूनी विवादों में लगी और इसका सीधा असर विकास कार्यों पर पड़ा। उनका दावा है कि इसी वजह से संस्था आज अपनी वास्तविक क्षमता की तुलना में काफी पीछे है।
‘यह विकास यात्रा अकेले मेरी नहीं’
चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा संस्था की उपलब्धियों का श्रेय अकेले लेने के बजाय शिक्षकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों, पूर्व विद्यार्थियों और क्षेत्र के लोगों की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं।
उनका कहना है कि वर्ष 1990 में बेहद सीमित आर्थिक संसाधनों से शुरू हुई जिम्मेदारी के बाद संस्था को आर्थिक रूप से मजबूत करने और नई पीढ़ी के लिए बेहतर शैक्षिक वातावरण तैयार करने का लगातार प्रयास किया गया।
एक लंबी विरासत, एक अधूरा लक्ष्य
जाट कॉलेज से जनता वैदिक शिक्षण संस्थाओं तक की यात्रा केवल नाम परिवर्तन या भवन निर्माण की कहानी नहीं है। यह शिक्षा के विस्तार, आर्थिक आत्मनिर्भरता, तकनीकी शिक्षा, खेल सुविधाओं और आधुनिक शैक्षिक व्यवस्था विकसित करने की लंबी प्रक्रिया है।
2 रुपये 89 पैसे की आर्थिक स्थिति से शुरू हुई जिम्मेदारी के बाद करीब 400 दुकानों, विशाल भवनों, मल्टीपर्पज हॉल, स्टेडियम, रेसलिंग स्टेडियम, आईटीआई और नए पाठ्यक्रमों तक पहुंची विकास यात्रा संस्था के विस्तार को दर्शाती है।
वहीं, चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा द्वारा बताए गए 56 मुकदमों और लंबे विवादों का अध्याय संस्था के विकास की दूसरी तस्वीर सामने रखता है। उनका मानना है कि इन परिस्थितियों ने संस्था की विकास गति को गंभीर रूप से प्रभावित किया और यदि ये बाधाएं नहीं आतीं तो संस्था आज कई दशक आगे होती।
शिक्षा, संसाधन और विकास की इस पूरी यात्रा में चौधरी वीरेंद्रपाल सिंह लाहोड़ा का कार्यकाल एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में सामने आता है।



