सिंगरौली

नगर निगम में उपयंत्री की एडवांस हाजिरी से लेकर आवास के नाम पर वसूली के आरोप

आखिर कब टूटेगी खामोशी? आयुक्त सविता प्रधान की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।

सिंगरौली। सिंगरौली नगर निगम एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। इस बार मामला केवल निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, वार्डों की उपेक्षा या प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि नगर निगम में पदस्थ उपयंत्री संजीव अहिरवार पर लगे गंभीर आरोपों ने पूरे निगम प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ उपस्थिति रजिस्टर में समय से पहले कई दिनों की हाजिरी दर्ज करने का मामला सामने आया है, तो दूसरी ओर कलेक्ट्रेट जनसुनवाई में प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ दिलाने के नाम पर कथित रूप से ₹10 हजार की मांग किए जाने की शिकायत ने नगर निगम की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

सबसे पहले चर्चा उस उपस्थिति रजिस्टर की, जिसकी प्रतिलिपि सामने आने के बाद नगर निगम में हड़कंप मच गया। दस्तावेज के अनुसार 13 जुलाई 2026 को जिस रजिस्टर की जानकारी सामने आई, उसमें उपयंत्री संजीव अहिरवार द्वारा 20 जुलाई 2026 तक की उपस्थिति पहले से दर्ज किए जाने की बात सामने आई। यदि यह तथ्य सही है तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर कोई कर्मचारी या अधिकारी भविष्य की तारीखों में अपनी उपस्थिति किस आधार पर दर्ज कर सकता है?

सरकारी कार्यालयों में उपस्थिति रजिस्टर केवल औपचारिक दस्तावेज नहीं होता, बल्कि यह कर्मचारी की वास्तविक उपस्थिति और कार्य निष्पादन का आधिकारिक रिकॉर्ड होता है। ऐसे में भविष्य की तारीखों में हस्ताक्षर होना न केवल प्रशासनिक नियमों पर प्रश्नचिन्ह लगाता है बल्कि पूरे निगरानी तंत्र की गंभीर कमजोरी को भी उजागर करता है।

मामले को और गंभीर तब माना जाने लगा जब वार्ड पार्षद परमेश्वर पटेल ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि उपयंत्री संजीव अहिरवार नियमित रूप से वार्डों का दौरा नहीं करते। उनका कहना है कि महीने में एक-दो बार ही क्षेत्र में दिखाई देते हैं, जबकि अधिकांश समय नगर निगम कार्यालय के कमरों में ही व्यतीत करते हैं। पार्षद का आरोप है कि जिन अधिकारियों को विकास कार्यों की निगरानी करनी चाहिए, वे फील्ड में जाने के बजाय कागजों में ही काम निपटाने में लगे हुए हैं।

सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि संबंधित अधिकारी वार्डों में नहीं पहुंचते तो निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की निगरानी कौन करता है? नगर निगम क्षेत्र में पहले भी घटिया निर्माण, अधूरे कार्य और गुणवत्ता संबंधी शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। ऐसे में निरीक्षण की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी यदि मौके पर नहीं पहुंचते तो जनता के टैक्स के पैसे से होने वाले कार्यों की गुणवत्ता पर स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा होता है।

इसी बीच संजीव अहिरवार की मुश्किलें उस समय और बढ़ गईं जब कलेक्ट्रेट में आयोजित जनसुनवाई में एक शिकायतकर्ता ने उनके खिलाफ गंभीर आरोप लगाए। शिकायतकर्ता का दावा है कि प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ दिलाने के नाम पर उससे ₹10 हजार की मांग की गई। पीड़ित ने प्रशासन को लिखित शिकायत देकर मामले की जांच और कार्रवाई की मांग की है।

हालांकि इस आरोप की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और न ही संजीव अहिरवार का पक्ष सार्वजनिक रूप से सामने आया है, लेकिन जनसुनवाई जैसे आधिकारिक मंच पर पहुंची शिकायत ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है। क्योंकि प्रधानमंत्री आवास योजना देश की सबसे महत्वपूर्ण जनकल्याणकारी योजनाओं में से एक है, जिसका उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद परिवारों को पक्का मकान उपलब्ध कराना है। यदि इस योजना में लाभ दिलाने के नाम पर किसी प्रकार के सुविधा शुल्क या अवैध वसूली की शिकायत सामने आती है तो यह बेहद गंभीर विषय माना जाएगा।

अब सबसे बड़ा सवाल नगर निगम प्रशासन और विशेष रूप से नगर निगम आयुक्त सविता प्रधान की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहा है। नगर निगम में प्रशासनिक अनुशासन बनाए रखना, कर्मचारियों और अधिकारियों की जवाबदेही तय करना तथा भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर नियंत्रण रखना आयुक्त की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल है। लेकिन लगातार सामने आ रहे विवादों ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर निगम प्रशासन की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

शहर में चर्चा है कि यदि किसी सामान्य कर्मचारी पर भविष्य की तारीख में उपस्थिति दर्ज करने का आरोप लगता तो तत्काल स्पष्टीकरण मांग लिया जाता और विभागीय कार्रवाई शुरू हो जाती। लेकिन जब मामला प्रभावशाली अधिकारियों का होता है तो जांच की रफ्तार धीमी क्यों पड़ जाती है? यह सवाल अब आम नागरिकों के बीच भी चर्चा का विषय बन चुका है।

विपक्षी जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नगर निगम में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी लगातार दिखाई दे रही है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि उपस्थिति रजिस्टर में सामने आई कथित अनियमितता की जांच हुई या नहीं, जनसुनवाई में आई शिकायत पर क्या कार्रवाई की गई, और यदि आरोप निराधार हैं तो प्रशासन ने उन्हें खारिज करने के लिए क्या कदम उठाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच ही एकमात्र रास्ता है। उपस्थिति रजिस्टर, फील्ड निरीक्षण रिपोर्ट, निर्माण कार्यों के निरीक्षण अभिलेख, प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़े दस्तावेज और शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत तथ्यों की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए। इससे सच्चाई सामने आएगी और जनता का विश्वास भी बना रहेगा।

सिंगरौली नगर निगम पहले भी कई बार विवादों और शिकायतों को लेकर सुर्खियों में रहा है। लेकिन इस बार मामला सीधे प्रशासनिक जवाबदेही, सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए इस मामले को केवल एक कर्मचारी या अधिकारी तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।

अब निगाहें नगर निगम आयुक्त सविता प्रधान पर टिकी हैं। जनता यह देखना चाहती है कि वे इन आरोपों और शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेती हैं। क्या उपस्थिति रजिस्टर में सामने आई कथित अनियमितता और जनसुनवाई में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा?

फिलहाल इतना तय है कि उपयंत्री संजीव अहिरवार से जुड़े इन दो मामलों ने नगर निगम प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अब प्रशासन के पास अवसर है कि वह पारदर्शिता और जवाबदेही का परिचय देते हुए जनता के सामने सच्चाई रखे। क्योंकि सवाल केवल एक अधिकारी का नहीं, बल्कि नगर निगम की पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का है।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button