गाजियाबाद

“खाकी” पर भारी “खादी”

लोनी में दिखा थानेदार साहब व पुलिस का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में है!

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : लोनी के रेड फ्लेम रेस्टोरेंट में शनिवार  शाम  बहुचर्चित प्रेस वार्ता में केवल आधा-अधूरा ‘अनुमति का ज्ञान’ ही नहीं बंटा, बल्कि एक और सच्चाई कैमरे की जद में बिल्कुल साफ हो गई। वह यह कि भले ही थानेदार साहब की वर्दी पर ‘उत्तर प्रदेश पुलिस’ लिखा हो, लेकिन उनके भीतर की आत्मा पर पूरी तरह से सत्ताधारी नेताजी का दबाव हावी था। जिससे कारण वह मौके पर पहुंचकर आपसी सौहार्द और भाईचारे के लिए बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस में शांति प्रिय लोगों पर ही क्षेत्र में दंगा कराने के आरोप लगाते हुए नजर आए
प्रेस वार्ता के दौरान मौके पर पहुंचे थानेदार साहब द्वारा पीसी की अनुमति होने के सवाल पर जब पत्रकारों ने संवाद के दौरान कहा कि किसी बंद कमरे, अपने नीति स्थल या रेस्टोरेंट में पीसी के लिए अनुमति की आवश्यकता कब होती, तो एसओ साहब के चेहरे के उड़ते रंग और लड़खड़ाती जुबान साफ गवाही दे रही थी कि स्क्रिप्ट कहीं और से लिखकर आई है। जिन्होंने अनुमति होना जरूरी बताकर इस मामले में अपनी अभिज्ञता व राजनीतिक दबाव होने का  परिचय दिया । क्षेत्र में शांति व्यवस्था व कानून की किताब पढ़ा रहे  साहब बार-बार यह भूल जा रहे थे कि वे संविधान की शपथ लेकर कुर्सी पर बैठे हैं, न कि किसी राजनीतिक आका के दरबार में हाजिरी लगाकर, मौके पर मौजूद  हर शख्स को यह साफ दिख रहा था कि थानेदार साहब खुद कुछ नहीं बोल रहे हैं, बल्कि उनके पीछे खड़ा “सत्ता का अदृश्य हाथ” का आशीर्वाद उनसे अपने मनमाफिक बुलवा रहा है। थानेदार साहब द्वारा पत्रकारों को नियम-कायदों का पाठ पढ़ाने की बेबसी दरअसल कुछ और नहीं, बल्कि सत्ताधारी नेताओं को खुश करने और अपनी कुर्सी बचाने की एक नाकाम छटपटाहट दिखाई दे रही थी! जिस कारण वहां का माहौल किस कदर खराब हुआ, सैकड़ों लोगों ने देखा, हुड़दंग व गाली गलौच वहां क्यों हुई किसके साथ हुई पुलिस मौके पर मौजूद होने के बाद भी उसे क्यों नहीं देख पाई इसका जवाब घटना स्थल पर मौजूद लोग खोज रहें है

अब लोनी के चौक-चौराहों पर यह चर्चा जोरों पर है कि जब रक्षक ही सत्ता के दबाव में  अपने घुटने टेक दे, तो आम जनता को न्याय की उम्मीद किससे करनी चाहिए? जनता पूछ रही है कि साहब का रिमोट कंट्रोल आखिर किस माननीय के पास है, जिसके इशारे पर वह मीडिया के सामने भी खाकी का रौयब झाड़ते हुए सच को झूठ साबित करने का असफल प्रयास करने से नहीं चूके। हालांकि सच तो सच है, उसे झूठलाया नहीं जा सकता।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button