राष्ट्रपति के सम्मान पर भाजपा का दोहरा चरित्र- विजय शंकर नायक
BJP's double standards on President's honour: Vijay Shankar Nayak

नेशनल प्रेस टाइम्स ब्यूरो।
रांची। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय शंकर नायक ने कहा कि भारत का राष्ट्रपति केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि संविधान की सर्वोच्च गरिमा और लोकतांत्रिक संतुलन का प्रतीक होता है। इसलिए राष्ट्रपति पद का सम्मान किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की संवैधानिक जिम्मेदारी है। हाल के दिनों में भारतीय राजनीति में एक विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर भाजपा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee पर राष्ट्रपति Droupadi Murmu की उपेक्षा का आरोप लगाकर राजनीतिक हमला कर रही है, वहीं दूसरी ओर कई ऐसे उदाहरण सामने आते हैं जहाँ स्वयं भाजपा सरकार पर राष्ट्रपति पद की गरिमा को पर्याप्त महत्व न देने के आरोप लगे हैं। सबसे बड़ा उदाहरण 28 मई 2023 को नए संसद भवन के उद्घाटन का है। संसद देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है और संविधान के अनुसार राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग माने जाते हैं। इसके बावजूद उद्घाटन प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा किया गया। इस निर्णय ने कई संवैधानिक विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच बहस को जन्म दिया कि क्या ऐसे ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रपति को केंद्रीय भूमिका नहीं दी जानी चाहिए थी। इसी तरह अयोध्या में बने Ram Mandir के भूमि पूजन और प्राण प्रतिष्ठा जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में भी राजनीतिक नेतृत्व केंद्र में रहा। ऐसे अवसरों पर भी यह सवाल उठता रहा कि देश के प्रथम नागरिक को अपेक्षित महत्व क्यों नहीं मिला। भाजपा अक्सर यह दावा करती है कि उसने पहली बार किसी आदिवासी महिला को राष्ट्रपति बनाकर सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है। यह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन लोकतंत्र में केवल पद देना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उस पद की गरिमा और संवैधानिक भूमिका को भी समान रूप से सम्मान देना आवश्यक होता है। आज भारतीय राजनीति में आदिवासी पहचान भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुकी है। झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में आदिवासी मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में आलोचकों का आरोप है कि कई बार प्रतीकों का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है। इसी पृष्ठभूमि में जब भाजपा बंगाल में ममता बनर्जी पर राष्ट्रपति के सम्मान का मुद्दा उठाती है, तो यह सवाल भी सामने आता है कि क्या उसे पहले अपने राजनीतिक आचरण की समीक्षा नहीं करनी चाहिए। भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी संस्थाओं—राष्ट्रपति, संसद, न्यायपालिका और चुनाव आयोग—का सम्मान किया जाए। इन संस्थाओं को राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनाने के बजाय उनकी संवैधानिक गरिमा को बनाए रखना सभी दलों की जिम्मेदारी है। अंततः सवाल यही है कि क्या राष्ट्रपति पद का सम्मान वास्तव में संवैधानिक भावना से किया जा रहा है, या फिर उसे भी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बना दिया गया है। जब तक इस पर ईमानदार आत्ममंथन नहीं होगा, तब तक यह बहस जारी रहेगी।



