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बुंदेलखंड की बदहाली को बदलने का दस सूत्रीय रोडमैप — डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

A ten-point roadmap to transform Bundelkhand's plight — Dr. Atul Malikram (Political Strategist)

नेशनल प्रेस टाइम्स ब्यूरो।
बुंदेलखंड की धरती, जो कभी अपनी वीरता और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्व विख्यात थी, आज गरीबी, बेरोजगारी और पलायन के अभिशाप से कराह रही है। यहाँ के गाँवों में फैली भुखमरी और अभाव की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठी सरकारें मानो इस पीड़ा को सुनने में असमर्थ हैं। नीति आयोग का बहुआयामी गरीबी सूचकांक भी इस सच्चाई की पुष्टि करता है कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश देश के सबसे गरीब राज्यों में शामिल हैं, और इन राज्यों के बुंदेलखंड क्षेत्र के जिले इस सूची में शीर्ष पर हैं। चित्रकूट, टीकमगढ़ और बाँदा जैसे इलाकों में आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है। स्पष्ट है कि बुंदेलखंड को केवल चुनावी वादों की नहीं, बल्कि एक ठोस और समग्र कार्ययोजना की आवश्यकता है, जिसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। सबसे पहला कदम एक सटीक और पारदर्शी डेटाबेस तैयार करना होना चाहिए। जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति कौन है और उसकी वास्तविक जरूरतें क्या हैं, तब तक योजनाओं का लाभ बिचौलियों तक ही सीमित रहेगा। आयुष्मान भारत, पीएम आवास और लाड़ली बहना जैसी योजनाओं को एकीकृत कर ऐसा तंत्र विकसित करना होगा, जिससे कोई भी पात्र परिवार वंचित न रहे। केवल ई-केवाईसी के आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं; योजनाओं का धरातल पर पहुँचना ही सफलता का मापदंड होना चाहिए। आर्थिक सशक्तिकरण के लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि हर गरीब परिवार का कम से कम एक सदस्य रोजगार या स्वरोजगार से जुड़ा हो। इसके लिए स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार कौशल विकास केंद्र स्थापित किए जाएँ, जो केवल प्रमाण पत्र न दें बल्कि रोजगार की गारंटी भी सुनिश्चित करें। स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए ऋण प्रक्रिया को सरल बनाया जाए और डेयरी, पोल्ट्री तथा मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में सहकारी मॉडल को अपनाया जाए। किसानों और कारीगरों को बिचौलियों के शोषण से बचाने के लिए मजबूत सहकारी समितियाँ बनाना अत्यंत आवश्यक है। स्थानीय उत्पादों को ई-कॉमर्स और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा जाए ताकि लाभ सीधे उत्पादकों तक पहुँचे। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे स्तर की फूड प्रोसेसिंग इकाइयों—जैसे आटा मिल, तेल मिल और मसाला पैकेजिंग—की स्थापना से स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।
स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। कुपोषण से जूझ रहे क्षेत्रों में आंगनबाड़ी सेवाओं को सशक्त किया जाए और पोषण योजनाओं को प्रभावी रूप से लागू किया जाए। गरीब छात्रों के लिए छात्रवृत्ति और उच्च गुणवत्ता वाले कोचिंग केंद्र स्थापित किए जाएँ, ताकि प्रतिभा आर्थिक अभाव में दम न तोड़े। महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता योजनाओं का दायरा और राशि दोनों बढ़ाई जानी चाहिए। अंततः, बुंदेलखंड का विकास किसी एक विभाग का कार्य नहीं है, बल्कि एक समन्वित प्रयास की मांग करता है। इसके लिए एकीकृत कार्ययोजना बनाकर उसकी नियमित समीक्षा मुख्यमंत्री स्तर पर होनी चाहिए। औद्योगिक पैकेजों का लाभ सीधे स्थानीय लोगों तक पहुँचना चाहिए। अब समय आ गया है कि सरकारें अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएँ और बुंदेलखंड को विकास की मुख्यधारा में लाएँ। यदि ऐसा नहीं होता, तो क्षेत्रीय असंतोष बढ़ेगा और अलग राज्य की मांग तेज हो सकती है। बुंदेलखंड का स्वाभिमान तभी लौटेगा जब हर हाथ को काम और हर परिवार को सम्मानजनक जीवन

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